साबरमती का सत्याग्रह – आश्रम एक सांकेतिक स्थान पर बना हुआ है . किंवदंती है कि प्राचीन काल में इन्द्र के वज्र के लिए अपनी अस्थियां समर्पित करनेवाले दधीचि ऋषि का आश्रम इसी स्थान पर था .  प्राचीन काल के इस ऋषि के आत्माहुति की कहनी जितनी अदभुत है , उससे कम रोमहर्षक अर्वाचीन काल में उसी स्थान पर आश्रम की स्थापना करनेवाले महात्मा की गाथा नहीं है .   बापू कई बार कहते : ‘मेरा आश्रम बहुत अच्छे स्थान पर बना है . एक ओर दूधेश्वर ( श्मशान ) है तो दूसरी ओर जेल . इस आश्रम में रहनेवालों के लिए जेल कोई नई बात नही है , वैसे दूधेश्वर – श्मशान भी कोई डर की बात नहीं होनी चाहिए . ‘ कोई अन्तेवासी बापू की बात को पूरी करते हुए कह देगा : ‘हां बापू , और आपके आश्रम के बिलकुल सामने ही मिल के ये भोंपू खड़े हैं . वे याद दिला रहे है कि खादीवालों को किसका सामना करना है . ‘

   बापू के मेरे प्रथम स्मरण के साथ ही साबरमती – जेल का स्मरण भी जुड़ा है . सुबह – शाम टहलने के लिए बापू निकलते . साथ में चलनेवालों के कंधों पर बापू हाथ रख देते . जिनके कंधों पर बापू हाथ रखते थे , वे ‘ बापू की लकड़ी ‘ बन जाते . ऐसी मानव-लकड़ी के सहारे चलने में बापू को क्या आराम मिलता होगा यह तो वे ही जानें , लेकिन ‘ लकड़ियां ‘ उसमें गर्व का अनुभव अवश्य करतीं थीं . बापू के दोनों ओर चलते की होड़ में कभी – कभी लकड़ियों को टकराते हुए भी मैंने देखा है .

   छोटे होने के नाते लकड़ी बनने में हमारी पसन्द पहले होती थी . रोज सुबह – शाम बापू के निवास – स्थान , मगनकुटी , या हृदयकुंज से निकलकर साबरमती सेण्ट्रल – जेल के दरवाजे तक जाकर वापस आने का रिवाज था .

   वैसे भी हम लोगों की अपेक्षा बापू तेज ही चलते थे . लेकिन जेल का फाटक नजदीक आया हो और उस समय किसीके साथ गंभीर बात न चलती हो तो आखिर के पचास गज का यह फासला बापू मानो दौड़ लगा कर तय करते थे . कभी – कभी हम लोग बापू का हाथ अपने कंधों से हटा कर दौड़ते-दौड़ते आगे पहुंच जाते थे . ध्येय तक पहुंचते समय गति तीव्र करने में कुछ और ही मजा आता था . कभी -कभी हम ऐसा करने जाएं , उसके पहले ही बापू हमारे कंधों पर अपना पूरा भार डालकर पांव ऊपर उठा लेते और कहते , ‘क्यों सेठजी , अब दौड़ो , देखें !’ हरएक प्रेमीजन की तरह बापू को भी अपने प्रेम – पात्र को दुलार का नाम देना और बीच – बीच में उसे बदलते रहना अच्छा लगता था . इस प्रकार के मिले लाडले नामों में मेरा एक नाम ‘सेठिया’ था . इस शब्द में विनोद अवश्य छिपा है , लेकिन आज इस नाम के साथ आम तौर पर जो भावना मन में आती है , वैसी कोई भावना उस समय मेरे दिमाग में नहीं उठती थी .

     लौटते हुए बापू आम तौर से किसी बीमार आश्रमवासी को देखने जाते . रोज दोनों समय बापू की इस भेंट के कारण कुछ आश्रमवासियों को अपनी बीमारी भी एक भाग्य जैसी लगती होगी . बीमारों को इस तरह देखने में अनायास बापू की आश्रम – परिक्रमा हो जाती थी .

   उस समय के सत्याग्रह-आश्रम में और आज के हरिजन – आश्रम में काफ़ी अन्तर है – बाहरी दर्शन में और वातावरण में भी . आज की अपेक्षा उस समय का आश्रम बाहर अधिक छोटा और जंगल जैसा था . वातावरण की दृष्टि से वह बहुत ही स्वच्छ और शान्त था . मगनकुटी और हृदयकुंज के बीच आज की तरह  ही प्रार्थना – भूमि तो थी , लेकिन मगनकुटी और प्रार्थना – भूमि के बीच नदी का पक्का घाट नहीं था . वहां दत्तात्रेय का एक छोटा-सा मन्दिर था,वह आज भी है;लेकिन उसका मह्त्व घट गया है . उन दिनों वहां साल में एक बार शायद गुरु-पूर्णिमा के दिन, रात को देर तक पंडित खरे के नेतृत्व में संगीत – संकीर्तन का जलसा ही लग जाता था . प्रार्थना-भूमि पर आज नीम का एक ही पेड़ है,उन दिनों तीन थे . उत्तर की ओर के पेड़ के नीचे प्रार्थना के समय बापू बैठते थे . दूसरा पेड़ पूर्व की तरफ ठेठ नदी के किनारे था . साधु सुरेन्द्रजी आश्रम में नये-नये आये थे,तब इस पेड़ के नीचे उनका तरु-तलवास रहता था . आज ये दोनों पेड़ साबरमती की बाढ़ में विलीन हो गये हैं. नदी के घाट के पश्चिम में,आज जहां गांधी-संग्रह के आधुनिक लेकिन सादगीपूर्ण मकान हैं, वहां पहले खेत था . उन दिनों इस भाग का वातावरण बिलकुल ही दूसरा था -अधिक ग्रामीण और अधिक अकृतिम .

       दक्षिण दिशा के नदी-किनारे हृदयकुंज के पास एक छोटा-सा कमरा था,वहां बीमार को देखने बापू को जाना नहीं पड़ता था .मीराबहन ( मिस स्लेड) वहां रहती थीं,तब वह बापू के साथ नियमित घूमने आती थीं . विनोबा इसी जगह रहते थे.उस समय भी बापू को वहां जाना नही पड़ता था,क्योंकि दुबले-पतले होते हुए भी विनोबा शायद ही बीमार पड़ते थे .

   विनोबाजी के कमरे के उस पार ‘नन्दिनी’ में बापू को कई बार जरूर जाना पड़ता था . वहां आम तौर से मेहमान रहते थे . इनमें कई लोग बीच बीच में बीमार पड़ते . सत्याग्रहाश्रम के प्रयोग सम्पूर्ण जीवन को लेकर चलते थे , उनमें आरोग्य सम्बन्धी प्रयोग भी शामिल थे . वैसे तो आहार के प्रयोगों का बापू को स्वभावत: ही शौक था . उसमें भी आश्रमवासियों में कोई प्रयोगवीर निकल जाए, तो फिर पूछना ही क्या! बिना पकाया अन्न खाने के प्रयोग , विविध प्रकार से स्नान करने के प्रयोग,पेट पर और सिर पर मिटी की पटी रखने के प्रयोग-इत्यादि कई प्रकार के प्रयोग चलते.उसमें भी खूबी यह कि हर प्रयोग में बापू ही निष्णात सलाहकार! चिकित्सा में अनेक तत्वों का उपयोग होता था . आश्रम के जीवन में नियमितता थी,संयम था.हवा,पानी,आकाश का प्राकृतिक सेवन था .परम्परागत चिकित्सा-पद्धति छोड़कर नये-  नये प्रयोग करने की हविस थी और शायद सबसे बढ़कर परिणामकारी दवा थी बापू की निजी देखभाल,उनकी निष्ठा और उनकी विनोदवृत्ति . दक्षिण भारत से आये हुए श्री मैथ्यू ‘नन्दिनी’ मे बहुत रहे थे . उनके हालचाल पूछने के लिए वहां बापू बीच में जाते थे.

   ‘नन्दिनी’ के पश्चिम में उन दिनों उद्योग-मन्दिर था,आज वहां कन्या-छात्रालय है.मुख्य उद्योग बुनाई का था . हमारे समय वहां कताई-बुनाई अधिक होती थी . कभी-कभी वहां हमारे क्लास भी चलते थे .

   अश्रम के बीच से आज की तरह उस समय भी सड़क थी . लेकिन तब कच्ची थी और कम इस्तेमाल होती थी .

    सड़क की दूसरी ओर सोमनाथ छात्रालय था . वहां लडकियां रहती थीं और कुछ वर्ग भी चलते थे . उस समय इतनी लड़कियां क्या सीखने आती थीं और कितने दिन रहती थीं,वह तो आज याद नहीं है,लेकिन इतना अवश्य याद है कि सोमनाथ छात्रालय हमेशा भरा रहता था और बीमारों को देखने वहां भी बीच-बीच में बापू जाते थे .

  सड़क की पश्चिम की तरफ सोमनाथ छात्रालय के उत्तर में मकानों की दो कतारें ( चालें ) थीं , उनका कार्यकर्ता-निवास या ऐसा कुछ प्रतिष्ठित नाम था या नहीं,आज ठीक से याद नहीं है . आश्रम के लोग उसे ‘आगे की’ और ‘पीछे की’ चाल कहते थे .इन मकानों में बापू के हाथ -पांव रहते थे,ऐसा कह सकते हैं . स्व. किशोरलाल मशरूवाला वहां कुछ दिन थे . सर्वश्री छगनलाल गांधी , नरहरि परीख , पण्डित खरे,मथुरादास आसर,तोतारामजी,छगनलाल जोशी,भगवानजीभाई पण्डया , माधवलालभाई और अन्य अनेक कार्यकर्ता इन चालों में रहते थे . हम कई साल तक आगे की चाल में थे . इस चाल में कार्यकर्ता अपने कुटुम्ब के साथ रहते थे . इसलिए मुझे तो लगता था कि मेरी उम्र के सब बच्चे वहीं रहते थे . दोनों चालों के बीच श्री नारायणदास गांधी का मकान था .

   सड़क के पश्चिम में आगे की चाल के उत्तर में इमाम साहब का मकान और उसके पीछे जमनाकुटी थी .सबसे पीछे सात कोठरी.जमनाकुटी में बीच में कुछ दिन स्व.जमनालालजी का कुटुंब रहता था .

   जेल की तरफ जानेवाली सड़क पर प्राणजीवनदास मेहता के पुत्र श्री रतिलाल का लाल बंगला था . जेल की जमीन के पास श्री बुधाभाई का मकान था,उसको ‘सफ़ेद बंगला’ कहते थे . इमाम साहब का मकान और पीछे की चाल के बीच हमारे लिए एक मकान बना था,उसे ‘आनन्द निवास’ कहते थे .

   यह था उस समय का ( यानि १९२७ से १९३० तक का ) सत्याग्रह-आश्रम का विस्तार.वहां के एक एक-एक व्यक्ति के साथ बापू का व्यक्तिगत सम्बन्ध था .उनके खाने-पीने,रहने आदि के सब प्रश्नों में बापू की गहरी दिलचस्पी रहती थी .इन लोगों की व्यक्तिगत या सामूहिक साधना में भी बापू का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध रहता था .

   एक तरह से देखा जाय तो एक विशाल कुटुम्ब के बापू ‘कुलपति’  ही थे . वह संस्था पितृप्रधान थी.लेकिन बापू के सम्बन्ध में मेरी निजी छाप बिलकुल ही दूसरी है .आश्रम में अन्य बालकों की भी यही छाप रही होगी , ऐसा मुझे निश्चित रूप से लगता है .

    बापू सारे आश्रम के ‘बापू’ (पिताजी) थे .देश के वे नेता थे,जनता के ‘महात्मा’ थे . लेकिन इससे बढ़कर हमारे तो वे ‘दोस्त’ ही थे.हमें कभी भी दोस्त के अतिरिक्त और कुछ वे लगे ही नही.घूमते समय हमारे साथ विनोद करते हों,प्रात:काल अखाड़े में व्यायाम सीखने के लिए जब हम जाते तब वहां आकर हमारी मदद करते हों,गंभीर मुद्रा में प्रार्थना में बैठे हों,या हृदयकुंज में बैठकर किसी बड़े नेता के साथ महत्वपूर्ण चर्चा करते हों – बापू हमेशा हमें दोस्त ही लगते !

    आश्रम के नियम थे हमेशा सख़्त,-अक्सर कडे तो कभी-कभी कठोर. उन नियमों के कारण कैयों को आश्रम छोड़ना भी पड़ा था. नियम बनानेवाले बापू थे .हरेक नियम के बारे में उनका निर्णय अन्तिम होता था . फिर भी हम लोगों को बापू कभी भी नियम-निर्माता,या अधियन्ता के रूप में दिखाई नहीं दिये.हमारे पारम्परिक सम्बन्धों में हमें एक ही नियम दिखता था-दोस्ती का.

    रसोईघर का ही उदाहरण लीजिए . आश्रम के सब लोग सामूहिक रसोड़े में ही भोजन करें , ऐसा नियम था. मेरे पिताजी ने इस नियम का विरोध किया और घर पर अलग रसोई बनाने की छूट प्राप्त की. फिर भी मेरी मां के लिए सामूहिक रसोड़े ( भोजनालय )  में मदद के लिए जाने की शर्त थी . लेकिन मैं जिस प्रसंग की बात करने जा रहा हूं , वह हमें अलग रसोड़े में खाने की छूट मिलने से पहले का है .

    आश्रम में घण्टी का आधिपत्य शायद बापू के बाद पहले नम्बर का था . सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक की लगभग हर क्रिया के लिए घण्टी बजती थी . एक जमाने में हमने गिनती की थी कि दिनभर में छप्पन बार घण्टियां बजती थीं .भोजन का समय होने पर पहली घण्टी बजती – या यों कहूं तो शायद अधिक सही होगा कि भोजन की घण्टी बजती तभी खाने का समय होता था . दूसरी घण्टी बजने पर रसोईघर के दरवाजे बन्द हो जाते थे और्र तीसरी घण्टी बजने पर मन्त्र बोला जाता था .भोजनगृह तक पहुंचने के लिए सीढ़ी चढ़कर जाना पड़ता था . एक बार भोजन के लिए पहुंचने में मुझे देर हो गयी . सीढ़ी पर चढ़ रहा था कि दूसरी घण्टी बजी और दरवाजा बन्द हो गया . आज तक कब किस बच्चे ने भोजन – सबन्धी नियमों का पालन किया है ? लेकिन यहां तो मेरे और खाने के बीच में बन्द दरवाजा खड़ा था . मैं मन ही मन सोचता रहा-अन्दर चार कतारों में लोग खाने बैठे होंगे,थाली में खिचड़ी,तरकारी,दूध और डबल रोटी परोसी गयी होगी . मेरी मां रसोईघर के अन्दर काम करती हुई चिन्ता करती होगी कि मैं नहीं आया हूं . दरवाजे के पास बैठ बापू चारों ओर नजर घुमाकर अपना मधुर हास्य बिखेरते होंगे .

    किसीने सुझाया या मुझे ही सूझा यह अब याद नहीं आता है ,लेकिन दरवाजे के पास खड़ा होकर अचानक मैंने गाना शुरु किया -

” मंगल मन्दिर खोलो !

 ”दयामय ! मंगल मन्दिर खोलो .”

    स्व. नरसिंहराव (पू. प्र.मं. नहीं) ने अपनी सन्तान के पुण्यस्मरण के निमित्त इस पवित्र गीत की रचना की थी , तब क्या उनको कल्पना भी होगी कि उनके गीत की कडी का इस तरह भी उपयोग होगा ?

  भोजनगृह में शान्ति थी , इसलिए मेरा बाल-स्वर अन्दर तक पहुंचा .सुनकर बापू हंसने लगे और रसोड़े के बन्द दरवाजे ‘बाबला’ के लिए खुल गये.