चि. नारायण की पुस्तक की पुस्तक ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ के आपके भेजे फरमे एक ही बैठक में पढ़ गया । पूरा पी लिया समझो । पूरी पुस्तक एक उर्मिल काव्य जैसी है । कहीं-कहीं मानो टेनिसन का ‘इन मेमोरियम’ गद्य में पढ़ रहे हैं , ऐसा लगता है ।
उसमें स्व. महादेवभाई की सरस्वती और स्व. दुर्गाबहन की भक्ति की विरासत इकट्ठा हुई है । अलावा इसके निर्दोष विनोद उसकी अपनी विशेष उपलब्धि है , जो आरम्भ के प्रकरणों के हर पृष्ट पर बिखरी है । भणसाळीभाई के विषय का प्रकरण पढ़ते समय हँसते -हँसते पेट दुखने लगा । उल्लास-भरे मन से झपट लेने जैसी कोई किताब कई सालों के बाद पढ़ी हो तो वह यही है ।
( पू. स्वामी आनन्द के एक पत्र का अंश)