बापू की गोद में

पुस्तक समर्पण

प्रकाशकीय

प्राक्कथन : दादा धर्माधिकारी

लेखक के दो शब्द

मंगल मन्दिर खोलो !

प्रभात किरणें

पूरे प्रेमीजन रे

हर्ष शोक का बँटवारा

स्नेह और अनुशासन

१९३० – ३२ की धूप – छाँह

नयी तालीम का जन्म

बापू की प्रयोगशाला

यज्ञसंभवा मूर्ति

अग्निकुण्ड में खिला गुलाब

वह अपूर्व अवसर

मोहन और महादेव

भणसाळीकाका

मैसूर और राजकोट

मेरे लिए एक स्वामी बस है !

परपीड़ा

बा

दूसरा विश्व-युद्ध और व्यक्तिगत सत्याग्रह

आक्रमण का अहिंसक प्रतिकार

जमनालालजी

९ अगस्त , १९४२

अग्नि – परीक्षा

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प्रकाशकीय

वर्षों पूर्व ‘जन्मभूमि’ गुजराती – पत्र में प्रतिसप्ताह ‘स्वातंत्र्य संग्रामनी गाथा’ स्तम्भ में श्री नारायणभाई ने बापू के सम्बन्ध में धारावाहिक रूप में संस्मरण लिखे थे , जो बाद में ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ शीर्षक से पुस्तकाकार में प्रकाशित हो गये । सौभाग्य से आज वे हिन्दी में रूपान्तरित होकर पाठकों के समक्ष उपस्थित हैं । २२ प्रकरणों की यह छोटी-सी पोथी गांधीजी के अनेक अनजाने अलौकिक गुणों पर प्रकाश डालती है । प्रस्तुत संस्मरणों की विशेषता श्री दादा धर्माधिकारी ने प्राक्कथन में लिपिबद्ध कर दी है । संस्मरण तो अनूठे हैं ही , लेखक की साहित्यिक प्रतिभा ने उन्हें रसाप्लुत भी बना दिया है ।

    गांधी – शताब्दी के शुभ -अवसर पर हमें इस पुस्तक के प्रकाशन का सुअवसर मिला था । अब हम इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्र्काशित कर यह आशा करते हैं कि पाठकों को प्रथम संस्करण की भाँति निश्चय ही यह रोचक और उद्बोधक सिद्ध होगा। गुजराती-भाषी जनता ने जिस प्रकार इस श्रेष्ठ रचना का आदर किया है , हम समझते हैं कि कि हिन्दी-भाषी जनता भी इसमें पीछे नहीं रहेगी । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता का हिन्दी-रूपान्तर करने में श्री भवानीप्रसाद मिश्र ने सहयोग दिया, अत: हम उनके आभारी हैं ।

         – सर्व सेवा संघ प्रकाशन , राजघाट , वाराणसी-२२१००१.

(जून १९९६)

प्राक्कथन : दादा धर्माधिकारी

श्री नारायण देसाई कि ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ मूल गुजराती में पढ़ी । एक अनूठी कलाकृति है । उसमें आत्मकथा की सजीवता और प्रतीति है , फिर भी अहन्ता का दर्प नहीं है । जिन घटनाओं और परिस्थियों का वर्णन इस छोटी-सी पुस्तक में है , उनके साथ लेखक का घनिष्ठ और प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहा है । वह केवल एक तटस्थ प्रेक्षक नहीं रहा है । कई प्रसंगों में उसकी अपनी भूमिका भी महत्वपूर्ण है । परन्तु अन्य व्यक्तियों की भूमिका का चित्रण करने में उसने अपने को गौण स्थान ही दिया है । लेखक की सदभिरुचि का यह द्योतक है ।

     ‘मोहन और महादेव’ इस सुन्दर पुस्तक की दो विभूतियाँ हैं । ‘हरि-हर’ की तरह उनका विभूतिमत्त्व अविभाज्य है । अनेक घटनाओं और प्रसंगों के चित्रण में नारायणभाई ने उस विभूतिमत्त्व की जो झाँकियाँ दिखाई हैं , वे नितान्त मनोज्ञ हैं । ‘साबरमती’ और ‘सेवाग्राम’ आधुनिक भारत के विश्व-तीर्थ माने जाते हैं। वहाँ के आन्तरिक जीवन के जो दर्शन इस पुस्तक में कराये गये हैं , वे हृदयस्पर्शी हैं । नारायणभाई की भाषा में एक अन्लंकृत लावण्य है ।

    पृष्ठ २३ पर लेखक के मानस पर जो छाप पड़ी , उसकी उपमा उसने कृष्णपक्ष के नभोमण्डल से दी है । पुस्तक में करुण , उदात्त आदि रसों के साथ-साथ ऋजु और सौजन्ययुक्त विनोद की छटाएँ भी हैं , जो उसे अधिक चित्ताकर्षक बनाती हैं
लेखक की सहृदयता की छाप तो पृष्ट-पृष्ट पर है ।

    इस पुस्तक का हिन्दी-भाषान्तर हमारे मित्र श्री दत्तोबा दास्ताने ने किया है । दत्तोबा का ‘उपनयन’ पवनार के सन्त ने किया है । उनके जीवन में जो संस्कारिता और प्रगल्भता है , वह विनोबा के साथ दीर्घ-सहवास का परिपाक है। नारायणभाई को भाषान्तरकार भी समानशील मिले । पाठक की दृष्टि से यह बड़ा शुभ संयोग है। गांधी की विभूति की विविधता की झाँकी जो देखना चाहते हों , उनके लिए यह पुस्तक निस्सन्देह उपादेय है ।

शिवकुटी , माउण्टआबू

२० – १ – ‘६९                                                     – दादा धर्माधिकारी

मंगल मन्दिर खोलो !

साबरमती का सत्याग्रह – आश्रम एक सांकेतिक स्थान पर बना हुआ है . किंवदंती है कि प्राचीन काल में इन्द्र के वज्र के लिए अपनी अस्थियां समर्पित करनेवाले दधीचि ऋषि का आश्रम इसी स्थान पर था .  प्राचीन काल के इस ऋषि के आत्माहुति की कहनी जितनी अदभुत है , उससे कम रोमहर्षक अर्वाचीन काल में उसी स्थान पर आश्रम की स्थापना करनेवाले महात्मा की गाथा नहीं है .   बापू कई बार कहते : ‘मेरा आश्रम बहुत अच्छे स्थान पर बना है . एक ओर दूधेश्वर ( श्मशान ) है तो दूसरी ओर जेल . इस आश्रम में रहनेवालों के लिए जेल कोई नई बात नही है , वैसे दूधेश्वर – श्मशान भी कोई डर की बात नहीं होनी चाहिए . ‘ कोई अन्तेवासी बापू की बात को पूरी करते हुए कह देगा : ‘हां बापू , और आपके आश्रम के बिलकुल सामने ही मिल के ये भोंपू खड़े हैं . वे याद दिला रहे है कि खादीवालों को किसका सामना करना है . ‘

   बापू के मेरे प्रथम स्मरण के साथ ही साबरमती – जेल का स्मरण भी जुड़ा है . सुबह – शाम टहलने के लिए बापू निकलते . साथ में चलनेवालों के कंधों पर बापू हाथ रख देते . जिनके कंधों पर बापू हाथ रखते थे , वे ‘ बापू की लकड़ी ‘ बन जाते . ऐसी मानव-लकड़ी के सहारे चलने में बापू को क्या आराम मिलता होगा यह तो वे ही जानें , लेकिन ‘ लकड़ियां ‘ उसमें गर्व का अनुभव अवश्य करतीं थीं . बापू के दोनों ओर चलते की होड़ में कभी – कभी लकड़ियों को टकराते हुए भी मैंने देखा है .

   छोटे होने के नाते लकड़ी बनने में हमारी पसन्द पहले होती थी . रोज सुबह – शाम बापू के निवास – स्थान , मगनकुटी , या हृदयकुंज से निकलकर साबरमती सेण्ट्रल – जेल के दरवाजे तक जाकर वापस आने का रिवाज था .

   वैसे भी हम लोगों की अपेक्षा बापू तेज ही चलते थे . लेकिन जेल का फाटक नजदीक आया हो और उस समय किसीके साथ गंभीर बात न चलती हो तो आखिर के पचास गज का यह फासला बापू मानो दौड़ लगा कर तय करते थे . कभी – कभी हम लोग बापू का हाथ अपने कंधों से हटा कर दौड़ते-दौड़ते आगे पहुंच जाते थे . ध्येय तक पहुंचते समय गति तीव्र करने में कुछ और ही मजा आता था . कभी -कभी हम ऐसा करने जाएं , उसके पहले ही बापू हमारे कंधों पर अपना पूरा भार डालकर पांव ऊपर उठा लेते और कहते , ‘क्यों सेठजी , अब दौड़ो , देखें !’ हरएक प्रेमीजन की तरह बापू को भी अपने प्रेम – पात्र को दुलार का नाम देना और बीच – बीच में उसे बदलते रहना अच्छा लगता था . इस प्रकार के मिले लाडले नामों में मेरा एक नाम ‘सेठिया’ था . इस शब्द में विनोद अवश्य छिपा है , लेकिन आज इस नाम के साथ आम तौर पर जो भावना मन में आती है , वैसी कोई भावना उस समय मेरे दिमाग में नहीं उठती थी .

     लौटते हुए बापू आम तौर से किसी बीमार आश्रमवासी को देखने जाते . रोज दोनों समय बापू की इस भेंट के कारण कुछ आश्रमवासियों को अपनी बीमारी भी एक भाग्य जैसी लगती होगी . बीमारों को इस तरह देखने में अनायास बापू की आश्रम – परिक्रमा हो जाती थी .

   उस समय के सत्याग्रह-आश्रम में और आज के हरिजन – आश्रम में काफ़ी अन्तर है – बाहरी दर्शन में और वातावरण में भी . आज की अपेक्षा उस समय का आश्रम बाहर अधिक छोटा और जंगल जैसा था . वातावरण की दृष्टि से वह बहुत ही स्वच्छ और शान्त था . मगनकुटी और हृदयकुंज के बीच आज की तरह  ही प्रार्थना – भूमि तो थी , लेकिन मगनकुटी और प्रार्थना – भूमि के बीच नदी का पक्का घाट नहीं था . वहां दत्तात्रेय का एक छोटा-सा मन्दिर था,वह आज भी है;लेकिन उसका मह्त्व घट गया है . उन दिनों वहां साल में एक बार शायद गुरु-पूर्णिमा के दिन, रात को देर तक पंडित खरे के नेतृत्व में संगीत – संकीर्तन का जलसा ही लग जाता था . प्रार्थना-भूमि पर आज नीम का एक ही पेड़ है,उन दिनों तीन थे . उत्तर की ओर के पेड़ के नीचे प्रार्थना के समय बापू बैठते थे . दूसरा पेड़ पूर्व की तरफ ठेठ नदी के किनारे था . साधु सुरेन्द्रजी आश्रम में नये-नये आये थे,तब इस पेड़ के नीचे उनका तरु-तलवास रहता था . आज ये दोनों पेड़ साबरमती की बाढ़ में विलीन हो गये हैं. नदी के घाट के पश्चिम में,आज जहां गांधी-संग्रह के आधुनिक लेकिन सादगीपूर्ण मकान हैं, वहां पहले खेत था . उन दिनों इस भाग का वातावरण बिलकुल ही दूसरा था -अधिक ग्रामीण और अधिक अकृतिम .

       दक्षिण दिशा के नदी-किनारे हृदयकुंज के पास एक छोटा-सा कमरा था,वहां बीमार को देखने बापू को जाना नहीं पड़ता था .मीराबहन ( मिस स्लेड) वहां रहती थीं,तब वह बापू के साथ नियमित घूमने आती थीं . विनोबा इसी जगह रहते थे.उस समय भी बापू को वहां जाना नही पड़ता था,क्योंकि दुबले-पतले होते हुए भी विनोबा शायद ही बीमार पड़ते थे .

   विनोबाजी के कमरे के उस पार ‘नन्दिनी’ में बापू को कई बार जरूर जाना पड़ता था . वहां आम तौर से मेहमान रहते थे . इनमें कई लोग बीच बीच में बीमार पड़ते . सत्याग्रहाश्रम के प्रयोग सम्पूर्ण जीवन को लेकर चलते थे , उनमें आरोग्य सम्बन्धी प्रयोग भी शामिल थे . वैसे तो आहार के प्रयोगों का बापू को स्वभावत: ही शौक था . उसमें भी आश्रमवासियों में कोई प्रयोगवीर निकल जाए, तो फिर पूछना ही क्या! बिना पकाया अन्न खाने के प्रयोग , विविध प्रकार से स्नान करने के प्रयोग,पेट पर और सिर पर मिटी की पटी रखने के प्रयोग-इत्यादि कई प्रकार के प्रयोग चलते.उसमें भी खूबी यह कि हर प्रयोग में बापू ही निष्णात सलाहकार! चिकित्सा में अनेक तत्वों का उपयोग होता था . आश्रम के जीवन में नियमितता थी,संयम था.हवा,पानी,आकाश का प्राकृतिक सेवन था .परम्परागत चिकित्सा-पद्धति छोड़कर नये-  नये प्रयोग करने की हविस थी और शायद सबसे बढ़कर परिणामकारी दवा थी बापू की निजी देखभाल,उनकी निष्ठा और उनकी विनोदवृत्ति . दक्षिण भारत से आये हुए श्री मैथ्यू ‘नन्दिनी’ मे बहुत रहे थे . उनके हालचाल पूछने के लिए वहां बापू बीच में जाते थे.

   ‘नन्दिनी’ के पश्चिम में उन दिनों उद्योग-मन्दिर था,आज वहां कन्या-छात्रालय है.मुख्य उद्योग बुनाई का था . हमारे समय वहां कताई-बुनाई अधिक होती थी . कभी-कभी वहां हमारे क्लास भी चलते थे .

   अश्रम के बीच से आज की तरह उस समय भी सड़क थी . लेकिन तब कच्ची थी और कम इस्तेमाल होती थी .

    सड़क की दूसरी ओर सोमनाथ छात्रालय था . वहां लडकियां रहती थीं और कुछ वर्ग भी चलते थे . उस समय इतनी लड़कियां क्या सीखने आती थीं और कितने दिन रहती थीं,वह तो आज याद नहीं है,लेकिन इतना अवश्य याद है कि सोमनाथ छात्रालय हमेशा भरा रहता था और बीमारों को देखने वहां भी बीच-बीच में बापू जाते थे .

  सड़क की पश्चिम की तरफ सोमनाथ छात्रालय के उत्तर में मकानों की दो कतारें ( चालें ) थीं , उनका कार्यकर्ता-निवास या ऐसा कुछ प्रतिष्ठित नाम था या नहीं,आज ठीक से याद नहीं है . आश्रम के लोग उसे ‘आगे की’ और ‘पीछे की’ चाल कहते थे .इन मकानों में बापू के हाथ -पांव रहते थे,ऐसा कह सकते हैं . स्व. किशोरलाल मशरूवाला वहां कुछ दिन थे . सर्वश्री छगनलाल गांधी , नरहरि परीख , पण्डित खरे,मथुरादास आसर,तोतारामजी,छगनलाल जोशी,भगवानजीभाई पण्डया , माधवलालभाई और अन्य अनेक कार्यकर्ता इन चालों में रहते थे . हम कई साल तक आगे की चाल में थे . इस चाल में कार्यकर्ता अपने कुटुम्ब के साथ रहते थे . इसलिए मुझे तो लगता था कि मेरी उम्र के सब बच्चे वहीं रहते थे . दोनों चालों के बीच श्री नारायणदास गांधी का मकान था .

   सड़क के पश्चिम में आगे की चाल के उत्तर में इमाम साहब का मकान और उसके पीछे जमनाकुटी थी .सबसे पीछे सात कोठरी.जमनाकुटी में बीच में कुछ दिन स्व.जमनालालजी का कुटुंब रहता था .

   जेल की तरफ जानेवाली सड़क पर प्राणजीवनदास मेहता के पुत्र श्री रतिलाल का लाल बंगला था . जेल की जमीन के पास श्री बुधाभाई का मकान था,उसको ‘सफ़ेद बंगला’ कहते थे . इमाम साहब का मकान और पीछे की चाल के बीच हमारे लिए एक मकान बना था,उसे ‘आनन्द निवास’ कहते थे .

   यह था उस समय का ( यानि १९२७ से १९३० तक का ) सत्याग्रह-आश्रम का विस्तार.वहां के एक एक-एक व्यक्ति के साथ बापू का व्यक्तिगत सम्बन्ध था .उनके खाने-पीने,रहने आदि के सब प्रश्नों में बापू की गहरी दिलचस्पी रहती थी .इन लोगों की व्यक्तिगत या सामूहिक साधना में भी बापू का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध रहता था .

   एक तरह से देखा जाय तो एक विशाल कुटुम्ब के बापू ‘कुलपति’  ही थे . वह संस्था पितृप्रधान थी.लेकिन बापू के सम्बन्ध में मेरी निजी छाप बिलकुल ही दूसरी है .आश्रम में अन्य बालकों की भी यही छाप रही होगी , ऐसा मुझे निश्चित रूप से लगता है .

    बापू सारे आश्रम के ‘बापू’ (पिताजी) थे .देश के वे नेता थे,जनता के ‘महात्मा’ थे . लेकिन इससे बढ़कर हमारे तो वे ‘दोस्त’ ही थे.हमें कभी भी दोस्त के अतिरिक्त और कुछ वे लगे ही नही.घूमते समय हमारे साथ विनोद करते हों,प्रात:काल अखाड़े में व्यायाम सीखने के लिए जब हम जाते तब वहां आकर हमारी मदद करते हों,गंभीर मुद्रा में प्रार्थना में बैठे हों,या हृदयकुंज में बैठकर किसी बड़े नेता के साथ महत्वपूर्ण चर्चा करते हों – बापू हमेशा हमें दोस्त ही लगते !

    आश्रम के नियम थे हमेशा सख़्त,-अक्सर कडे तो कभी-कभी कठोर. उन नियमों के कारण कैयों को आश्रम छोड़ना भी पड़ा था. नियम बनानेवाले बापू थे .हरेक नियम के बारे में उनका निर्णय अन्तिम होता था . फिर भी हम लोगों को बापू कभी भी नियम-निर्माता,या अधियन्ता के रूप में दिखाई नहीं दिये.हमारे पारम्परिक सम्बन्धों में हमें एक ही नियम दिखता था-दोस्ती का.

    रसोईघर का ही उदाहरण लीजिए . आश्रम के सब लोग सामूहिक रसोड़े में ही भोजन करें , ऐसा नियम था. मेरे पिताजी ने इस नियम का विरोध किया और घर पर अलग रसोई बनाने की छूट प्राप्त की. फिर भी मेरी मां के लिए सामूहिक रसोड़े ( भोजनालय )  में मदद के लिए जाने की शर्त थी . लेकिन मैं जिस प्रसंग की बात करने जा रहा हूं , वह हमें अलग रसोड़े में खाने की छूट मिलने से पहले का है .

    आश्रम में घण्टी का आधिपत्य शायद बापू के बाद पहले नम्बर का था . सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक की लगभग हर क्रिया के लिए घण्टी बजती थी . एक जमाने में हमने गिनती की थी कि दिनभर में छप्पन बार घण्टियां बजती थीं .भोजन का समय होने पर पहली घण्टी बजती – या यों कहूं तो शायद अधिक सही होगा कि भोजन की घण्टी बजती तभी खाने का समय होता था . दूसरी घण्टी बजने पर रसोईघर के दरवाजे बन्द हो जाते थे और्र तीसरी घण्टी बजने पर मन्त्र बोला जाता था .भोजनगृह तक पहुंचने के लिए सीढ़ी चढ़कर जाना पड़ता था . एक बार भोजन के लिए पहुंचने में मुझे देर हो गयी . सीढ़ी पर चढ़ रहा था कि दूसरी घण्टी बजी और दरवाजा बन्द हो गया . आज तक कब किस बच्चे ने भोजन – सबन्धी नियमों का पालन किया है ? लेकिन यहां तो मेरे और खाने के बीच में बन्द दरवाजा खड़ा था . मैं मन ही मन सोचता रहा-अन्दर चार कतारों में लोग खाने बैठे होंगे,थाली में खिचड़ी,तरकारी,दूध और डबल रोटी परोसी गयी होगी . मेरी मां रसोईघर के अन्दर काम करती हुई चिन्ता करती होगी कि मैं नहीं आया हूं . दरवाजे के पास बैठ बापू चारों ओर नजर घुमाकर अपना मधुर हास्य बिखेरते होंगे .

    किसीने सुझाया या मुझे ही सूझा यह अब याद नहीं आता है ,लेकिन दरवाजे के पास खड़ा होकर अचानक मैंने गाना शुरु किया –

” मंगल मन्दिर खोलो !

 ”दयामय ! मंगल मन्दिर खोलो .”

    स्व. नरसिंहराव (पू. प्र.मं. नहीं) ने अपनी सन्तान के पुण्यस्मरण के निमित्त इस पवित्र गीत की रचना की थी , तब क्या उनको कल्पना भी होगी कि उनके गीत की कडी का इस तरह भी उपयोग होगा ?

  भोजनगृह में शान्ति थी , इसलिए मेरा बाल-स्वर अन्दर तक पहुंचा .सुनकर बापू हंसने लगे और रसोड़े के बन्द दरवाजे ‘बाबला’ के लिए खुल गये.

प्रभात किरणें

कुछ समय के लिए बापू ने साबरमती के सत्याग्रह आश्रम का नाम बदलकर ‘ उद्योग – मन्दिर ‘ रखा था . ‘ सत्याग्रह – आश्रम ‘ नाम शायद भारी मालूम हुआ हो . ‘ उद्योग मन्दिर ‘ नाम उससे कम महत्वाकांक्षावाला और अधिक वास्तववादी कहा जाएगा . फिर भी संस्कृत भाषा और बापू की पसन्दगी , दोनों में यह खूबी थी कि ‘ आश्रम ‘ शब्द में ‘ श्रम ‘ शब्द था और ( मन्दिर को छोड़ दें तो भी ) ‘ उद्योग ‘ में योग शब्द था ही .

    आश्रम के एक स्थान का मूल नाम कायम रहा था – प्रार्थना – भूमि . आज जिसको उपासना – भूमि कहा जाता है , उस स्थान को सत्याग्रह – आश्रम से छोटी संग्य़ा बापू दे नहीं सके .

    कैसे दे सकते थे ? सत्याग्रह के विचार का जन्म ही प्रार्थना की भूमिका में से हुआ था . उस स्थान पर बापू का सत्याग्रही जीवन सोलह कलाओं से प्रकट होता था . प्रार्थना में जब केवल आश्रमवासे रहते , तब उनके एक – एक प्रश्नों को ले कर सत्याग्रही के नाते उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए , इस सम्बन्ध में बापू मार्गदर्शन करते थे . उनके विचार में सत्याग्रह महज अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ने का शस्त्र नहीं था . सत्याग्रह तो सत्य की खोज करनेवाले की सपूर्ण जीवन – पद्धति थी . इसीलिए जीवन के हर पहलू की परीक्षा प्रार्थना – भूमि में सत्याग्रह की कसौटी पर की जाती थी . उठने में देर क्यों हो जाती है ? प्रार्थना में झपकी क्यों लग जाती है ? स्वप्नदोष क कारण क्या है ? क्या क्रोध दु:साध्य रोग है ? क्या आश्रमवासियोंको जेवरों की आवश्यकता है ? आहार का परिणाम मन पर कितना कितना होता है ? इत्यादि कई व्यक्तिगत प्रश्नों की छानबीन बापू प्रार्थना के बाद करते थे .  इसी भूमि पर से बापू ने गीता पर प्रवचन भी किए थे . और दाण्डीकूच के समय लोगोंकी भारी भीड़ के कारण उपासना – भूमि की जगह छोटी पड़ी , तो साबरमती नदी के विशाल रेतीले तट का उपयोग करना पड़ा . पण्डित खरे की सागर – गम्भीर संगीत – ध्वनि , जो जड़ को भी दोलायमान करनेवाली थी , उस समय की मेदिनी के सामने अपर्याप्त साबित हुई .

    स्थल भी कितना रमणीय था ! एक ओर हृदयकुंज , दूसरी ओर दत्त – मन्दिर , तीसरी ओर वह नदी ,जो गरमी के मौसम में अन्त:स्रोता फलगू की तरह रुक्ष रेतेली , तो बारिश में तूफ़ानी बाढ़ से घों – घों करनेवाली , लेकिन बारहों मास उपासना – भूमि का पद – प्रक्षालन करते हुए अखण्ड बहती हुई साबरमती नदी !

    लेकिन इस प्रार्थना – भूमि के साथ मेरे बचपन के संस्मरण ( ४ से ७ वर्ष की उम्र तक के ) जाड़े के दिनों में उस भूमि पर क्रीड़ा करते हुए चकवे , मैना और मोरों की तरह ही खिलवाड़वाले हैं .

    बापू उत्तर की ओर के पेड़ के नीचे बैठते थे . बापू की एक ओर  बहनें और दूसरी ओर भाई बैठते थे . मैं प्रार्थना में जाने लगा , तब से ही मैंने अपना स्थान खोज लिया था . बहनों या भाइयों की पांत में बैठने के बदले मैंने बापू की गोद में बैठना शुरु किया . उस तथ्य के बारे में आज सोचता हूं तो लगता है कि वह कितना बड़ा भाग्य था और साथ ही कितनी जिम्मेदारियों से भरा था . लेकिन उस समय वहां जाकर बैठने का कारण शायद यही था कि सारी प्रार्थना का , आश्रम का और हमारी सारी दुनिया का केन्द्रस्थान बापू की गोद थी .

    कुछ दिनों बाद मेरा एक प्रतिस्पर्धी खडा हुआ . भाई प्रबोध चौकसी आश्रम में अपने नाना के पास कुछ दिन रहने आया . तब वह भी बापू की गोद में बैठने लगा . तब तक आश्रम में सब बच्चों में छोटा मैं ही था . लेकिन प्रबोध मुझसे भी छोटा था . इसलिए उसका हक नामंजूर हो ही नहीं सकता था . हम दोनों को अगल – बगल बैठाकर बापू ने समस्या का हल निकाल लिया .

    लेकिन कुछ दिनों बाद बढ़ती हुई और हमें सबके साथ प्रार्थना में ठीक ढंग से बैठने को कहा गया . हम बच्चे दोनों तरफ़ का लाभ उठाते . कभी भाइयों की कतार में बैठते तो किसी व्यक्ति-विशेष को चुनकर उनकी नकल करने में अपनी सारी सारी एकाग्रता का उपयोग करते थे . जब बहनों की कतार में बैठते तो भगवान के साथ तद्रूप बनने की इच्छा रखनेवाली साथ – साथ बैठी दो बहनों की चोटियां धीरे से जोड़ देने में हम सार्थकता का अनुभव करते थे .

    क्या आश्रम में एक भी बात ऐसी होती होगी , जो बापू के पास न पहुंचे ? ‘ बापू, आज खजूर का आधा फल अधिक खाया गया’, ‘गरम पानी से नहाना अच्छा या ठंडे पानी से?’ इत्यादि अनेक बातों का निर्णय बापू के द्वारा होता था . फिर हमारा यह नटखटपन तो शिकायत करने लायक था . उसको बापू के पास पहुंचने में देर ही क्या थी ? ‘ बापू यह बाबला ,धीरू और धर्मकुमार प्रार्थना के समय हमें सताते हैं . ‘

    हम मन में सोचते कि अब अदालत बैठेगी और वकील , गवाहों की जरूरत पड़ेगी . असहयोगियों की तरह हम अपना गुनाह सीधे – सीधे स्वीकार कर लें तो कैसा रहेगा ?

    लेकिन हमें अधिक देर इस सम्बन्ध में माथापच्ची नहीं करनी पड़ी . हमसे जवाबतलब न करते हुए बापू ने कह दिया कि ‘ अपनी प्रार्थना में इन बच्चों को क्या रस आता होगा ? उनके लिए अलग प्रार्थना की व्यवस्था करो . ‘

    मन में था वही मानो बैद ने बता दिया . लेकिन सच कहूं ? हमारी प्रार्थना में और क्या होता था यह तो आज याद नहीं है , लेकिन इतना जरूर याद है कि प्रार्थना के अन्त में रामायण की कथा सुनाई जाती थी . इसमें भी किष्किन्धा-काण्ड और लंका-काण्ड को छोड़ और कुछ भी याद नहीं है ,यह भगवान की कसम खा कर कह सकता हूं . रात को हम प्रार्थना में जो भी सुनते थे या बोलते थे ,उसकी छाप हमारे दैनन्दिन जीवन पर बड़ों की अपेक्षा अधिक जल्दी और गहरी पड़ती थी . मेरी मां पर उस समय आश्रम के कोठार ( भण्डार ) की किम्मेवारी थी . इससे पहले जिन भाइयों ने कोठार संभाला था, उनकी हर रोज हिसाब में कुछ-न-कुछ भूल रह जाती थी. लेकिन जब से बहनों ने काम संभाला,हिसाब बिलकुल ठीक मिल जाता था, इसकी मेरी मां को साभिमान खुशी थी .इसमें काम बहुत करना पड़ता था . एक दिन मां थकी-मांदी बड़ी देर से कोठार से आ रही थी कि आनन्द-निवास के फाटक के पास उसने बाबला को अलकतरा से हाथ-मुंह काला किये बड़े ठाठ के साथ बैठे देखा .

    ‘ हाय राम , यह तूने क्या किया ?’ मां ने अकुलाकर कहा .

    छोटे-छोटे चीथड़ों को एक – दूसरे से बांधकर लंकापति रावण के सिंहासन जितनी लंबी बनायी हुई लंगोटी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा , ‘ मारुति बना हूं,मारुति’ .

    यों तो बापू को हमारा यह नटखटपन अच्छा लगता था, बल्कि कभी मौका पा कर बापू हमारे साथ  खेल भी लेते थे .  लेकिन कभी – कभी वे हम पर दूसरी शिक्षा – पद्धति का भी प्रयोग करते थे और उसमें सफल भी होते थे . जो कोई सुबह देर से उठता था,उसको उठने की घण्टी बजाने का काम सौंपना यह बापू का इलाज सबको मालूम हो गया था .इसी तरह हमें कुछ-न-कुछ जिम्मेवारी का काम सौंपकर हमारे उत्साह और उधम को लगाम लगाने का काम बापू करते थे

बापू का आश्रम देखने आनेवालों की कमी तो थी नहीं . इन दर्शकों को देखकर कईबार उनका मजाक करने का जी होता था . एक बार एक अतिथी आये . वे आश्रम के व्यवस्थापक श्री नारणदासभाई का घर तलाश रहे थे . हम बच्चों में से किसी एक ने उनको पाखाने का रास्ता बता दिया . शायद ऐसे ही किसी कारण से मुझे एक अमेरिकन महिला को आश्रम दिखाने का काम सौंपा गया . एक बार जिम्मेदारी सौप दी , तो फिर हम उस काम आनाकानी नहीं करते थे . मैंने उस महिला को सब तरफ घुमा कर आश्रम दिखा दिया . उसके साथ के दुभाषिये की मदद से आश्रम में क्या काम चलता है , उसकी सारी जानकारी भी अपनी बुद्धी के अनुसार दे दी . एक कमरे में चक्की देख कर उस महिला को बड़ा अचरज हुआ ,लेकिन मुझे उससे भी ज्यादा अचरज यह जानकर हुआ कि इस बहन ने अब तक चक्की नहीं देखी है . मैंने चक्की चलाकर उसकी खूबी बताई . वह बहन खुश हो गयी और तुरन्त उसने मेरा फोटो उतार लिया . हम वहां से आगे बढ़े , तो उस बहन ने मुझे दो आने देने चाहे . मैंने लेने से इन्कार किया . उस बहन ने बहुत आग्रह किया , लेकिन मैं टस से मस नही हुआ . ‘यह तो खुश हो कर देना चाहती है , इसलिए ले लो ‘ दुभाषिये ने मुझे समझाने की कोशिश की . मैंने दुभाषिये से कहा , ‘ मैं पैसे के लिए इस बहन को आश्रम नहीं दिखा रहा हूं . बापू ने यह काम मुझे सौंपा , इसलिए कर रहा हूं . आपको पैसा देना हो तो आश्रम के व्यवस्थापक को दीजिये . मैं नहीं ले सकता . ‘
समाजशास्त्र का यह पाठ मुझे किसीने कभी सिखाया हो , यह याद नहीं पड़ता . एक मेहमान को आश्रम दिखाने का काम सौंपकर मुझ पर जो विश्वास रखा गया , उसीने यह पाठ मुझे सिखाया . लेकिन मैं यह दावा नहीं कर सकता कि किसी प्रकार की लांच-रिश्वत से मैं अछूता था .
सत्याग्रह – आश्रम में सी. आई. डी. के लोग सरकार की ओर से बराबर आते रहते थे . उसमें एक इस्माइलभाई नाम का खूफिया पुलिस था . हट्टा – कट्टा , श्यामवर्ण का ,और सिर पर रोएंदार टोपी . हम बच्चों को वह बहुत प्यारा लगता था . हम पर वह रिश्वत का सफल प्रयोग करता था . यह निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि वह केवल रिश्वत देता था या साथ – साथ लाड़-प्यार भी करता था . इस्माईलभाई हमेशा हमारे लिए पिपरमिण्ट की गोलियां ले आते . इसके बदले में हमेशा वह एक जानकारी लेना चाहता था – ‘आजकल गांधीजी क्या करते हैं , मुझे नहीं बताओगे ?’
पिपरमिण्ट की गोली से मुंह मीठा करके थोड़ी-सी जानकारी दे देने में हमें संकोच नहीं होता था . ‘ आजकल बापूजी कडुवे नीम की पत्ती की चटनी बनाने का प्रयोग कर रहे हैं ‘ , हमने एक बार कहा . और वह भला आदमी अपनी नोटबुक में बड़ी सावधानी से यह बात नोट कर लेता था . सत्य के प्रयोग करनेवाले बापू को इधर कोई सामाजिक जटिल समस्या हल करने जितना रस कडुवे नीम की पत्ती की चटनी बनाने में लगता था , तो उधर ब्रिटिश सरकार के इस बेचारे प्रतिनिधि को किसी गुप्त सभा की रिपोर्ट की नोंद लेने जितना मह्त्व इस गुप्त रसायन के अनुपान की नोंद करने में लगता था . गांधीजी का कौन-सा प्रयोग किस दिन सरकार को खतरे में डालनेवाला साबित होगा , क्या भरोसा ! चुटकीभर नमक बनाने से दिल्ली की सरकार का सिंहासन डगमगा जायगा , यह कौन जानता था ?
ये सारे प्रसंग दाण्डीकूच के पहले के हैं . उस समय मेरी उम्र मुश्किल से छह वर्ष थी . लेकिन उस समय आश्रम के वातावरण में ही ऐसी राजनीतिक जागृति थी कि अन्य बच्चों की अपेक्षा आश्रम के बच्चे जेल , पुलिस , खुफिया पुलिस , न्यायालय इत्यादि के अर्थ बहुत जल्दी समझ लेते थे . आश्रम मे सी. आई . डी . के लोग बराबर आते – जाते थे . इसलिए आश्रम के बड़े लड़कों  में से कुछ ने हम बच्चों को सचेत कर दिया था कि खबरदार ! कभी कई खबर उन लोगों को न देना . कुछ लोग हमारे सामने ऐसी भी कुछ बातें करते थे कि जिससे हम बच्चों के मन पर यह छाप पड़ती कि अंग्रेज अपने दुश्मन हैं . आश्रम में जो गीत कान में पड़ते , उनमें ये थे :
” मारो नहीं , मरना सीखो रे ,
यही गांधीजी का मंत्र .
मन्दिर ही मानो तुम जेल को ,
तुम होगे स्वतंत्र रे .. “

इन कड़ियों के साथ ही
” तकली नहीं यह तीर है ,
सरकार की छाती चीर दे .
बोलो बिरादर जोर से ,
इन्क़लाब जिन्दाबाद .. “
या –
” सा’ब, टोपावाले !
सा’ब टोपावाले !
मेरे मुल्क में कैसे आये ? “
इस तरह के गीत भी चलते . लेकिन कुल मिलाकर देखा जाय तो मेरे मन में किसी अव्यक्त सरकार नाम की शक्ति के विषय में शायद कुछ गुस्सा था , लेकिन उस सरकार के काले – गोरे या छोटे – बड़े किसी भी प्रतिनिधी के विषय में क्रोध नहीं था . बल्कि इस्माइलभाई जैसे और भी जो लोग हमारे परिचय में आये थे , उनके साथ हमारी सांठ-गांठ हो जाती थी . इसमें हमारे बाल-स्वभाव का हिस्सा जितना था ,उतना या उससे अधिक हिस्सा था बापू की लड़ने की पद्धति का .
इस लडाई के एक उज्जवल प्रसंग की धुंधली छाप मेरे मन पर पड़ी थी , उसका भी जिक्र यहां कर दूं .
लाहौर के कांग्रेस- अधिवेशन के बाद बापू ने वाइसराय को ११ मुद्दों वाला प्रसिद्ध पत्र लिखा . तब से सारे देश मे लड़ाई के नगाड़े बजने लगे थे . आश्रम में राजनीतिक लोगों का आना-जाना बढ गया था . जब से बापू ने जाहिर कर दिया कि वे १२ मार्च १९३० को दाण्डी की ओर कूच करेंगे और वहां पहुंच कर नमक बना कर कानून भंग करेंगे , तब से उनके इस कदम पर तरह तरह की अटकलबाजियां लगायीं जाने लगीं . श्री मोतीलाल नेहरू ने भी इस कदम की बुद्धिमानी के विषय में शंका व्यक्त की . आश्रम में यह अफवाह थी कि उस दिन के पहले ही शायद बापू को सरकार पकड़ लेगी .
दूसरे दिन से प्रार्थना नदी के रेतीले तट पर होने लगी . ११ मार्च को रात – भर लोगों की भीड़ जमा होती रही . सुबह इमली के पेड़ के नीचे देखते हैं कि मोटरों का तांता लगा है . शायद ही कोई अहमदाबाद की मोटर होगी , जो वहां न आई हो . बापू के साथ कूच में कौन कौन रहेंगे , इस विषय में आश्रम में बड़ी सरगरमी थी . चुने गये ७९ लोग फूले नही समाते थे , बाकि के लोग ‘ हमारी भी बारी आएगी’ यह आशा लगाये बैठे थे . हम बच्चों को इस तरह का कोई मौका तो था नहीं . सुबह पण्डितजी को प्रार्थना-भूमि तक जाने ही नहीं दिया , रास्ते में ही उनको घेर लिया गया . पण्डितजी ने धुन गाना शुरु किया: “रघुपति राघव राजाराम.” जहां तक मैं समझता हूं शायद इसी समय से यह धुन गांधी-धुन के नाम से प्रसिद्ध हो गयी . प्रार्थना में पण्डितजी ने भजन सुनाया : ” जानकीनाथ सहाय करें तब कौन  बिगाड़ करे नर तेरो . ” क्योंकि ‘ वैष्णवजन’ वाला पद कूच के समय गाया जाता था . गांधीजी इस तरह कूच का प्रारम्भ करेंगे . यह देखने के लिए लाखों की भीड़ तरस रही थी . लेकिन प्रार्थना की बाद बापू बीमारों को देखने गये .चेचक के कारण तीन बालकों की उस समय मृत्यु हो गयी थी . उनमें पण्डितजी का लडका बसन्त भी था .फिर भी पण्डितजी कूच में आगे – आगे थे .प्रेमाबहन दाण्डी कूच का दृश्य देख कर बावरी हो गयीं . बापू जिस शाल को ओढ़े हुए थे उस पर प्रेमाबहन ने एक बिल्ला लटका दिया और वह उनसे लिपट गयीं . शायद मणिबहन पारिख ने तिलक किया , सूत की गुन्डी पहनायी गयी और वैश्णवजन के साथ राम-धुन गाते हुए बापू निकल पडे . उनके साथ ठेठ असलाली तक सारा अहमदाबाद शहर उमड़ पड़ा .
पीछे आश्रम में हम बच्चे रह गये . बापू के जाने के बाद सुबह छ: बजे हम लोग झण्डा आदि ले कर जेल की तरफ ( दाण्डी कूच की उलटी दिशा में) निकल पड़े और हम ने कूच का आनन्द मनाया .

पूरे प्रेमीजन रे

बापू की लड़ाई की पद्धति का मुझे बचपन में ही अनुभव हो गया था . प्रसंग इस प्रकार था :

    शान्तिकुमार नरोत्तम मोरारजी ने बम्बई से मेरे लिए किसीके हाथ कुछ खिलौने भेजे थे . काका ( मेरे पिताजी ) जहां जाते , वहां उनके मित्र हो ही जाते थे . किन्तु उनमें से कुछ की मित्रता घनिष्ठ हो जाती . काका के साथ जिनकी घनिष्ठ मित्रता हो जाती , उनका हमारे साथ भी घरेलू सम्बन्ध जुड़ जाता था . शान्तिकुमारजी का बापू की तरह काका से घनिष्ठ सम्बन्ध था . इसलिए ये खिलौने उन्होंने मेरे लिए भेजे . साबरमती – आश्रम में यों तो खेलने को बहुत मिल जाता था , लेकिन खिलौने हमेशा नही मिलते थे . हमारे दुर्भाग्य से शान्तिकुमारजी के भेजे हुए खिलौने विदेशी थे . इसलिये हमारे पास पहुंचने के पहले ही बापू ने उन पर कब्जा कर लिया था . बापू ने अपने कमरे में दराज पर उनको रखवा दिया था . हमारी ‘ खूफिया – पुलिस ‘ को पता चल गया कि बाबला के लिए बम्बई से आये खिलौने बापूजी ने छिपाकर रखे हैं . ऐसे सरासर अन्याय के खिलाफ़ लड़ने के लिए हम लोगों ने तैयारियां शुरु कर दीं . कांग्रेस – युग का अनुकरण करते हुए लड़ाई का पहला कदम अपना प्रतिनिधि भेजकर उठाया जाय , ऐसा तय किया गया . खिलौने मेरे नाम से आये थे , इसलिए हमारे बाल – प्रतिनिधि – मण्डल की ओर से मुझे ही प्रवक्ता के रूप में चुना गया .

    उन दिनों बापू मगनकुटी में रहते थे . नित्य की तरह मेरे पिताजी बापू की बगल में बैठकर कुछ लिख रहे थे . दूसरे भी कुछ अन्तेवासी बापू के अगल – बगल बैठे थे . मोटी बा ( कस्तूरबा ) वहीं पर थीं . हमारा प्रतिनिधिमण्डल वहां जा पहुंचा .

    मैंने ही पहला वार किया , ‘ मेरे लिये बम्बई से खिलौने आये हैं , यह बात सही है ? ‘

    लड़ाई की शुरुआत में ही प्रतिपक्षी से सत्य को स्वीकार करा लेना उपयोगी होता है . बापू भी उस समय कुछ लिखने में मशगूल थे . लेकिन उन्होंने कागज पर से दृष्टि उठा कर मेरी तरफ देखा और कहा और कहा , ‘ कौन ? बाबला ? हां खिलौने के बारे में तूने जो सुना है , वह सही है . ‘

    ‘ मेरे खिलौने कहां हैं ? ‘ मेरे दूसरे प्रहार के पीछे बरामद माल का ठिकाना जानने की उत्सुकता थी , क्योंकि हमारे पास खबर पहुंची थी कि बापू ने खिलौने कहीं छिपा रखे हैं .

    ‘ वे रहे खिलौने दराज पर ‘ बापू ने उंगली से इशारा किया . तो , बरामद माल छिपा कर नहीं रखा था . अच्छी खासी डलियाभर खिलौने थे और सुन्दर इतने कि देखकर मुंह में पानी भर जाय !

   ’ ये खिलौने हमें सौंप दीजिये ‘ न्याय अपने साथ हो तो घुमा – फिरा कर बात करने की क्या आवश्यकता ? सीधे न्याय की मांग क्यों न की जाय ?

     तब बापू ने अपनी बात पेश की , ‘ तुझे मालूम है न कि ये खिलौने विदेशी हैं ? ‘ आश्रम तो स्वदेशी – आन्दोलन का पीठ – सा था . तो वहां के बच्चे विदेशी खिलौनों से कैसे खेल सकते हैं ? बापू को यह बात कहनी थी . लेकिन हम बच्चे उनकी बात समझने को राजी हों तब न ?

    ‘ स्वदेशी – विदेशी मैं कुछ नही जानता . मैं इतना जानता हूं कि खिलौने मेरे हैं . मेरे लिये वे भेजे गये हैं , इसलिये मुझे मिलने चाहिए ‘ मैंने अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए कहा . मुझे विश्वास था कि बापू मेरे अधिकार से इनकार नहीं कर सकेंगे . लेकिन बापू ने बात को ऐसा मोड़ दे दिया , जिसकी हमने कल्पना ही नही की थी .

    ‘ हम क्या विदेशी खिलौनों से खेलेंगे ? ‘ 

    हिन्दी ‘ हम ‘ शब्द में मैं का बहुवचन का अर्थ है . साथ – साथ ‘तू’ और ‘मैं’ का संग्रहवाचक भी वह शब्द है . लेकिन गुजराती में ‘आपणे’ शब्द में ‘तू’ और मैं यही भाव व्यक्त होता है . ‘मैं’ के बहुवचन के लिये गुजराती में ‘अमे’ शब्द अलग से है .

    और इस ‘आपणे’ शब्द में मानो बापू का ब्रह्मास्त्र भरा था . एक ही वाक्य में उन्होंने खुद को और मुझ को एक पक्ष का बना दिया . हम कमर कस कर लड़ने आये थे . कहां गया वह आवेश ? कहां गया वह प्रतिनिधिमण्डल ? कहां गयी वह आमने – सामने वागयुद्ध की वह तैयारी ? जब दुश्मन खुद ही मित्रपक्ष बन जाय , वहां युद्ध की तुला ही डगमगाने लगे तो क्या आश्चर्य !

    इन खिलौनों से खेलने का अपना अधिकार मुझसे छीना जा रहा था , लेकिन उनसे खेलने का अपना अधिकार भी तो बापू छोड़ रहे थे . तभी तो उन्होंने ‘हम’ कहा !

    और जब अधिकार केवल मेरा ही नहीं , बल्कि प्रतिपक्षी का भी है , यह बात ध्यान में आती है , तब अधिकार की जगह कर्तव्य – भावना का उदय हो जाता है .

    ‘विदेशी वस्तुओं के खिलाफ़ हम आन्दोलन चला रहे हैं’ और हमारे ही घर में विदेशी खिलौनों से खेला जाएगा ? ‘ बापू के सामने दलील करने या उन्हें समझाने की जरूरत ही नहीं रह गयी , प्रतिनिधिमण्डल के प्रवक्ता को ही परास्त होते देखकर मण्डल के दूसरे सदस्य चुपचाप खिसक रहे थे .

    विख्यात बाल – मनोवैग्यानिक नील का कहना है कि ‘ किसीका पक्ष लेना ‘ यही प्रेम करने की व्याख्या कही जा सकती है . ‘ इस स्थूल व्याख्या के अनुसार भी बापू को हमने अपने प्रेमीजन के रूप में देखा है

सत्याग्रह – आश्रम में भी पाठशाला थी . लेकिन कु. प्रेमाबहन कंटक हम लोगों को पढ़ाने आने लगीं , तब तक उसका हमें भान ही नही था . प्रेमाबहन के आने के कारण हमें पाठशाला के अस्तित्व का भान हुआ . पढ़ाने के काम में वे बहुत उत्साही थीं . आज मुझे उनके नाम के पूर्वार्ध का भी पर्याप्त अनुभव हुआ है . उन दिनों हम उनके नाम के उत्तरार्ध को ही सही मानते थे . हमारी इच्छा हो या न हो , वह पढ़ाये बगैर नहीं छोड़तीं . इस घटना के पांच – सात वर्ष बाद १९३७ में वर्धा में शिक्षा – शास्त्रियों के सामने बापू ने जब नयी तालीम के सम्बन्ध में विचार रखे , तब कई शिक्षा – शास्त्रियों ने कहा कि बापू के विचार में कोई नयी बात नहीं है . यदि मैं गलती नही कर रहा हूं , तो नागपुर की तरफ के एक शिक्षक ने तो यहां तक कह दिया कि ‘ ग्यान के साथ हाथ का उपयोग करने के विचार का अमल तो मैं पहले से ही करता आया हूं . बच्चे मेरे काबू में नहीं रहते हैं , तब छड़ी का उपयोग करके ग्यान के साथ हाथ का अनुबन्ध मैं करता हूं . ‘ नागपुर की तरफ के शिक्षक की नयी तालीम की यह व्याख्या प्रेमाबहन शायद बम्बई , पूना से सीखकर आयी होंगी . जब से हम उनके हाथ सौंपे गये , तब से वह भी ग्यानवर्धन के लिये अपने हाथों का प्रयोग हम पर करती थीं .

    ‘ उनके पास तो सीखना ही नहीं ‘ इस निश्चय को हम सत्याग्रही की तरह निभाते थे . कुछ – न – कुछ छोटे – बड़े प्रसंगों का निमित्त करके हम वर्ग में से या उद्योग में से गायब रहते थे . लेकिन ऐसा करते हुए जब हम पकड़े जाते , तब प्रेमाबहन तरह – तरह से सजाएं देतीं . उसमें एक समय का खाना बन्द करवाने की सजा तो आम हो गयी थी . लेकिन उपवासवीर बापू के आश्रम में एक समय का भोजन छोड़ना कोई नयी बात थोड़े ही थी . इसकी पूर्ती हम लोग आश्रम के खेतों के टमाटर आदि फल भरपेट खाकर फलाहार से कर लेते थे .

    ‘ छुट्टी मनाने ‘ का ऐसा ही एक प्रसंग था . बारिश हुई थी . सभी ऋतुओं में वर्षा ऋतु ही ऐसी कि गाती – बजाती आकर , अपने अस्तित्व का परिचय कराती है .  आश्रम में जगह – जगह छोटे – बड़े गड्ढों में पानी भर गया था . मैं घर से निकला तो था वर्ग के में जाने के लिए , लेकिन रास्ते में रीठे के पेड़ के नीचे एक डबरा मिल गया . उसमें छोटे – छोटे कीड़ों को डूबकर मरते देखा तो मेरे अन्दर का ‘ दीनबन्धु ‘ जाग उठा . पाठशाला में जाने के बदले इन उत्पीडित पिपीलिकाओं का उद्धार करने की मैंने ठान ली . रीठे का एक पत्ता लेकर उस से एक चीटी को किनारे पर रखा . एक ही चीटी क्यों ? एक साथ सब क्यों नहीं ? एक – एक करके सब चीटियों को उबार लेने की योजना थी . इस पद्धति में डबरे में डूबनेवाली चीटियों के उद्धार के साथ वर्ग के वातावरण में डूबनेवाले बाबला का भी उद्धार था .

    लेकिन इतनी आसानी से हार मान जांए तो वह प्रेमाबहन कैसी ? वर्ग में सौ फीसदी उपस्थिति होनी चाहिए , यह उनका आग्रह रहता था . इस आग्रह की पूर्ति के लिए वह सारे आश्रम का चक्कर लगा कर आ जातीं . पिपीलिकोद्धार के पुण्य कार्य में मैं एकचित्त हो गया था . तब रीठे के पेड के पीछे से आकर प्रेमाबहन ने मेरा कान पकड़ लिया . यहां गजग्राह की लड़ाई का प्रसंग नहीं बना और मैं भीगी बिल्ली की तरह प्रेमाबहन के साथ चल दिया . पता नहीं उनको क्यों मेरे कान से इतना प्यार हो गया कि वर्ग में पहुंचने तक उनके हाथों ने मेरे कान का सत्संग किया .

    उन दिनों बापू आश्रम में नहीं थे , इसलिए मैंने उनको एक पत्र लिखा . लिखा नहीं , लिखवाया . क्योंकि पत्र लिखना सीखें इसके बहुत पहले से बापू के साथ हमारा पत्र – व्यवहार चलता था . पण्डित खरे हम सबकी ओर से पत्र लिख देते और बापूजी कागज के टुकड़ों पर अपने हाथ से सबको जवाब लिखते . इस व्यवस्था के अनुसार मैंने बापूजी को पत्र लिखकर रीठे के पेड़ के नीचे जो घटना घटी , उसकी शिकायत दर्ज कर दी और यह भी पूछा कि ‘ आप अहिंसा में विश्वास रखते हैं फिर आपके आश्रम में ऐसी हिंसा क्यों ? ‘ जारी

    किसी प्रसंग के उचित या अनुचित होने के सम्बन्ध में दो रायें हो सकती हैं . यह हो सकता है कि आज वह प्रसंग मुझे जिस तरह याद आता है , उससे भिन्न प्रकार से प्रेमाबहन को याद आयेगा . लेकिन इतनी बात पक्की है कि बड़ों के साथ हम बच्चों का झगड़ा हो जाय , तो बापू हम लोगों के पक्ष में रहते थे . कुछ दिन बाद प्रेमाबहन को बापू ने पत्र लिखा . पत्र में क्या लिखा था मैं नही जानता . लेकिन इतना जानता हूं कि उसके बाद से ताड़न का प्रयोग हमेशा के लिए समाप्त हो गया .

     इस तरह बापू द्वारा मेरा पक्ष लेने के और भी प्रसंग याद आते हैं . यथास्थान उनका जिक्र करूंगा . अभी तो पण्डित खरे के मार्फत पत्र लिखवाने के समय का ही एक और प्रसंग याद आ रहा है . उसको दिये देता हूं .

    हर सप्ताह हम पत्र लिखते थे . उसमें आम तौर पर बापू से एक प्रश्न ही पूछते थे . सप्ताह में एक बार बापूजी का जवाब अवश्य मिल जाता था . जिस सप्ताह में जिसने प्रश्न पूछा होगा , वह बापू का जवाब जानने के लिए बड़ा उत्सुक रहता था . उसमें भी कौन अच्छी तरह प्रश्न पूछता है और बापू ने किसको कितना लम्बा जवाब दिया , यह भी स्पर्धा का विषय रहता था . मनुष्य के मन  से ही स्पर्धा समाप्त नही होती , तब तक आश्रम से वह कैसे समाप्त हो सकती थी .

    एक सप्ताह मैंने प्रश्न पूछा , ‘ बापूजी , हम इतने सारे बच्चे आपको इतने सारे प्रश्न पूछते हैं , लेकिन आप तो छोटे-से कागज के टुकडे पर जवाब लिख देते हैं . आश्रम में हम गीता कंठस्थ करते हैं . उसमें देखते हैं कि अर्जुन एक छोटा -सा प्रश्न पू्छता है और भगवान उत्तर में पूरा अध्याय बोल जाते हैं . फिर आप क्यों छोटा-सा जवाब देते हैं ?’

    इस प्रश्न की बड़ों ने प्रशंसा की , तो मुझे भी लगा कि यह बड़ा अहम सवाल मैंने उठाया है . इसके उत्तर की मैं बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगा .

    अपने छोटे पत्रों में भी सम्बोधनों का चुनाव करते समय बापूजी किसी नये प्रेमी के जितनी भावना भर देते थे . इस तरह मुझे भी कई प्रकार के सम्बोधन मिल चुके थे . ‘चि.बाबा’ से लेकर ‘चि. नारायण राव’ तक . इस बार भी ऐसे ही कुछ सम्बोधन का उपयोग बापू ने किया था . बदकिस्मती से वह पत्र आज मेरे संग्रह में नहीं है . लेकिन श्रुति भले न हो , स्मृति तो है ही .

    बापू ने लिखा था , ‘तेरा प्रश्न अच्छा है . लेकिन इतना ध्यान में रख कि श्रीकृष्ण को तो एक ही अर्जुन था . मेरे लिए तो तेरे जैसे कई अर्जुन हैं न ? ‘