वह अपूर्व अवसर

बापू के साथ ट्रेन में सफर करने का अनुभव कुछ अनोखा ही था । उन दिनों बापू सामान्य थर्ड क्लास में सफर करते थे । उनके लिए स्पेशल डिब्बा ट्रेन में जोड़ने की बात बहुत बाद में शुरु की गयी थी । आम तौर पर दूसरे मुसाफिरों की तरह वे सामान्य डिब्बे में बैठते थे। हाँ , इतना अवश्य होता था कि बापूजी बैठे हैं ,यह मालूम होते ही डिब्बे के लोग उनके लिए जगह कर देते ।

    लेकिन बापू के साथ का लवाजिमा छोटा नहीं होता था । उनके साथ उनके अन्तेवासी , रोगी , मुलाकाती , प्रयोगी सभी शामिल हो जाते थे। ‘कम सामान,अधिक आराम’ (ट्रैवल लाइट) का सूत्र उन दिनों चालू नहीं हुआ था । इसलिए ढेर सारा सामान पार्टी में हो जाता था । सामान की देखभाल करने की जिम्मेवारी आम तौर पर कनुभाई की रहती थी । मैं उनका सहायक था। सफर करते हुए या उसकी समाप्ति पर हम लोगों को जो नाश्ता मिलता था , उसको हम ‘कुली चार्ज’ कहते थे । कनुभाई और उनका यह बन्दा , दोनों कन्धे पर सामान ढोने में और ‘ कुली-चार्ज’ वसूल करने में शूर थे । सामान की गिनती एक बार , दो बार ,तीन बार होती थी । सफर के बीच में कोई भाई शामिल हो जाते थे उनके साथ का सामान हमारे सामान में मिल जाता था । आनेवाले भाई सामान को दर्ज नहीं कराते थे। स्टेशन पर उतरते समय अपने सामान की कोई फिकर नहीं करता था । फिर पड़ाव पर पहुँचने के बाद सब लोग हमारे पास सामान की तलाश करने आते। इस तरह बीच में ट्रेन में चढ़े हुए एक भाई के सामान को खोजने के लिए कनुभाई को एक बार कई स्टेशनों का सफर करना पड़ा था। सामान उठाने , ट्रेन में चढ़ाने , डिब्बे में ठीक ढंग से रखने और सफर समाप्त होने पर उसको उतारने का एक तंत्र हम लोगों ने बना लिया था । फिर भी बापू के आसपास जमा होने वाले शम्भू-मेले के कारण सामान के सम्बन्ध में किसी प्रकार के अनुशासन का पालन नहीं होता था । हाँ , हम लोगों को ‘कुली-चार्ज’ मिला या नहीं, यह देखने वाली बा बैठी रहतीं,तब तक तो कोई फिकर करने का कारण नहीं था ।

    बापू के लिए ठेठ कोने की जगह सुरक्षित रखी जाती थी । ऊपर की बर्थ हमारे लिए रहती थी । लेकिन एक बार ठीक बापू के ऊपर की बर्थ पर मैं अपना बिस्तरा लगाने लगा , तब कनुभाई और काका से डाँट खानी पड़ी । क्योंकि बापू के ऊपर की जगह पर कोई नहीं सोएगा , यह हमारी यात्रा का अलिखित नियम था । वैसे बापू अक्सर खिड़की के पास बैठते थे । लेकिन कभी- कभी आराम करने के लिए बीच की सीट पर भी जा बैठते थे ।

    लेकिन ट्रेन में बापू को आराम दुर्लभ था । दिन हो या रात का कोई भी समय हो , हर स्टेशन पर दर्शनार्थियों की जो भीड़ जमा हो जाती थी , वह उनको कहाँ चैन लेने देती थी । छोटे-बड़े हर स्टेशन पर गाड़ी प्लेट्फार्म पर लगते ही ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारे सुनाई देते थे । गाड़ी छूटने पर भी यह जयघोष जारी ही रहते थे ।

    मैं जिस कालखण्ड का वर्णन कर रहा हूँ , वह है सन १९३६ से १९४० के बीच का । स्वराज्य के आन्दोलन की दृष्टि से यह कालखण्ड मन्द ही कहा जाएगा । लेकिन दर्शनार्थियों के लिए कोई भी कालखण्ड मन्द नहीं था । रात को गाड़ी की बत्ती पर एक भूरे रंग की चड्डी हम लोग चढा देते थे, ताकि बापू कुछ देर सो सकें। यह चड्डी खास इसी उद्देश्य से बनाई गयी थी । लेकिन लोग टार्च की रोशनी उनके चेहरे पर फेकने की कोशिश करते थे। हम लोग खिड़की बन्द कर देते । भीड़ के लोग सन्डास की खिडकी के काँच भी तोड़ देते थे । वर्धा से दिल्ली ग्रैन्डट्रंक एक्सप्रेस से जाते और वापस आते समय झाँसी रात को ही पड़ता था । हर बार इस स्टेशन पर खिड़की तोड़ी जाती थी ।

    कभी – कभी काका लोगों से प्रार्थना करते थे , ‘ गांधीजी अभी सो रहे हैं, आप लोग जरा खामोश रहिए ।’ लोग जवाब देते,’अजी,वे तो देवता हैं,उनको नींद की क्या आवश्यकता है ?’ इस जवाब से काका चिढ़ जाते और कहते,’ अरे, उस देवता को तो आप लोग मन्दिर में बन्द करके रखते हैं । इस देव को तो घूमना पड़ता है। आपके लिए दिन-रात एक करना पड़ता है , क्या इन्हें आराम नही लेने देंगे ?

    एक बार हमारी यात्रा में पं. जवाहरलालजी साथ थे । हर स्टेशन पर जमा होने वाली भीड़ और शोर को देखकर उन्होंने काका से कहा,’महादेव,आज तुम आराम करो। भीड़ को संभालने का काम मैं करूँगा ।’ ‘गांधीजी की जय’ के साथ ‘जवाहरलाल की जय’ के नारे भी लगने लगे । पण्डितजी गरजकर बोले,’दर्शन करने हों तो मेरे कर लो । गांधीजी आराम कर रहे हैं । उन्हें जगाने नहीं दूँगा ।’ लोगों ने सौदा किया,’आप से तो भाषण सुनेंगें,गांधीजी के दर्शन करेंगे ।’ ‘ हमारा भाषण सुनना है तो उन्हें आराम करने देना होगा’ पण्डितजी ने शर्त लगाई ।

    लोगों ने भाषण सुन लिया । बापू यह सब सुन रहे थे । लेकिन आँखें बन्द करके शरीर को आराम देने की चेष्टा कर रहे थे । लोगों का अनुशासन देखकर काका का दिल पिघल गया । गाड़ी छूटने का समय हुआ तब काका ने बापू से पूछा,’जाग रहे हैं ?’ बापू बोले,’यहाँ सोने का प्रश्न ही कहाँ है ? ‘ काका ने कहा,’ये लोग बहुत शान्ति से खड़े थे, इनको दर्शन दीजिएगा ?’ पण्डितजी ने भी समर्थन किया । गाड़ी चल पड़ी तब कानपुर का पूरा स्टेशन ‘महात्मा गांधी की जय’ के निनाद से गूँज रहा था ।

    दूसरे एक स्टेशन पर तो पण्डितजी के लिए भी स्थिति संभालना कठिन हो गया । दिन का समय था । बापूजी इस डिब्बे में बैठे हैं यह देखकर एक भाई डिब्बे के बगल में खड़ा रहा । जैसे ही गाड़ी छूटी वह डिब्बे में चढने लगा । पण्डितजी चिल्लाये ,’इस डिब्बे में मत चढ़ो। इस में गांधीजी जा रहे हैं ।’ पहले तो उस भाई ने कानून बताया-’यह तो सामान्य डिब्बा है।इसमें किसी को भी सफर करने का अधिकार है, मेरे पास भी टिकिट है ।’ पण्डितजी लाल-पीले हो गए ।बोले,’आप मुझे कानून सिखाना चहते हैं ?यह बताइये कि आप जानते थे कि नहीं इसमें गांधीजी जा रहे हैं ?’ उस भाई ने ढ़ीली आवाज में कहा ,’जी हाँ,जानता था ।’

‘तो इसलिए आप इसपर चढ़े कि नहीं ?’

‘जी नहीं! गाड़ी छूट रही थी इसलिए चढ़ गया था ।’

‘ सरासर झूठ ! आप को नीचे उतार कर छोड़ूँगा ।’ यह कहकर पण्डितजी उसे हाथ पकड़कर उतारने लगे । इतने में बापू बीच में पड़े और उस भाई को चढ़ने दिया ।’

पण्डितजी का गुस्सा बहुत देर तक कम नहीं हुआ ।’कैसे बत्तमीज लोग होते हैं । गांधीजी के सामने झूठ बोलने में इनको शर्म नही आती है ।’ वह भाई आखिर तक कहता रहा कि मैं अचानक ही चढ़ गया हूँ । अगले स्टेशन पर वह उतर गया ।

    यात्रा के दरमियान दिन के समय पहचान के लोग हर स्टेशन पर मिलने आते थे । जगह-जगह फलों के पिटारे,भोजन और नाश्ता ले आते थे। हम लालच भरी निगाह से ‘कुली-चार्ज’ को देखते रहते थे

लेकिन बापू की लालचभरी निगाह तो दूसरी ही तरफ़ लगी रहती थी । हर स्टेशन पर बिना भूले वे ‘हरिजन फण्ड’ के लिए पैसा इकट्ठा करते थे। यह क्रम १९३४ से उनकी ‘हरिजन यात्रा’ से शुरु हुआ और ठीक अन्त तक जारी रहा । खिड़की में से बापू हाथ बाहर निकालकर पैसा माँगते थे। उनकी हथेली देखते-देखते पैसों से भर जाती। हम लोग भी हाथ या रुमाल लोगों के सामने फैलाते थे । मैं यह नहीं समझ पाता था कि लोग बापू के सिवा दूसरों के हाथ में क्यों पैसा देते थे । लेकिन देखा कि हम सबके हाथ पैसों से भर जाते थे । कभी-कभी तो एक स्टेशन पर जमा हुए फुटकर पैसों को गिनते-गिनते आगे का स्टेशन आ जाता था।

    मेरे मन में कई बार प्रश्न उठता था कि क्या ये लोग ‘बापू किस लिए पैसे माँग रहे हैं’ यह समझते भी होंगे ? क्या घर जा कर यह लोग छुआछूत छोड़ देने वाले हैं ? इस तरह पैसे इकट्ठा करने से हरिजनों का क्या उद्धार होने वाला है? लेकिन मैं देखता था कि पैसे देने वालों की आँखों में श्रद्धा भरी होती थी । ये लोग महात्मा के दर्शन के लिए आते थे और साथ-साथ कुछ दक्षिणा दे जाते थे। ‘हरिजन -फण्ड’ शब्द तो वे जरूर सुनते होंगे । कुछ लोग उस शब्द का अर्थ भी समझते होंगे । लेकिन श्रद्धापूर्वक दर्शन के लिए आने वाली यह भीड़ एक बात जरूर समझती थी, ऐसा मुझे लगा । चाहे जितना व्यस्त रहने पर भी बापू देश के दरिद्रनारायण को नहीं भूलते हैं,इतना वे लोग जानते थे । कभी-कभी ऐसा भी होता था कि बापू कुछ लिख रहे हैं और इतने में स्टेशन आ गया , तो इधर लिखने का काम जारी रखते हुए बापू एक हाथ खिड़की के बाहर निकाल देते । ऐसे मौके पर वे माँगते भी नहीं थे, फिर भी हाथ में टपाटप पैसे आ गिरते थे । भारत की जनता मानो साक्षात दरिद्रनारायण की पूजा ही करती थी । गरीब-से-गरीब व्यक्ति भी दरिद्रनारायण के इस प्रतिनिधि को देखकर उस समय ‘दानवीर’ बन जाता था । सैंकड़ों वर्षों की गुलामी, दरिद्रता और अज्ञान होते हुए भी भारत की प्रजा में अब भी अगर कुछ खमीर बचा हुआ है तो वह उसकी इस श्रद्धा के कारण ही है ।

    यह श्रद्धा वैसे तो सारे प्रदेशों में है ,लेकिन खास करके बिहार और आन्ध्र में वह मूर्तिमन्त हो जाती थी । आन्ध्र प्रदेश के स्टेशनों पर दर्शनार्थियों की भीड़ में हिन्दी का शब्द जानने वाला शायद ही कोई होगा । लेकिन उस जनता को दर्शन से ही परम तृप्ति का अनुभव होता था।

    हाँ, बिहार की जनता जरूर हिन्दी समझती है । लेकिन लाखों की उस भीड़ में गांधीजी के मुँह से निकलनेवाले शब्द उसके कानों तक थोड़े ही पहुँच सकते थे। फिर भी दूर-दूर के देहातों से कई दिन पैदल चलते हुए लोग बापू की ट्रेन जिस रास्ते से जाती होगी , उस रास्ते के रेलवे -स्टेशन पर पहुँच जाते थे । साथ में ‘सत्तू’ की पोटली बाँधकर लाते थे। भूख लगने पर सत्तू फाँक लेते थे और ‘गांधीजी बबुआ जीवो हो राम’ गाते हुए वापस जाते ।

    बिहार की भीड़ से परेशान हो कर कभी – कभी काका कह बैठते थे ,’ यह सब तुलसीदासजी की करामात है। उन्होंने रामायण में राम-दर्शन के लिए आने वाली भीड़ के स्तुतिस्तोत्र गा-गाकर लोगों को इस प्रकार पागल बना दिया है ।’ मैं हँसते हुए कहता था ,’काका, इस जमाने में तुलसीदास का यह काम तो आप ही कर रहे हैं,यह भूल जाते हो !’

    डिब्बे में बैठे हुए लोग यह सुनकर खूब हँसने लगते । उनकी हँसी पूरी होते-होते अगला स्टेशन आ ही जाता ।

    चम्पारण जिले का एक प्रसंग मैं कभी नहीं भूलूँगा । उन दिनों अवध-ति्रहुत ट्रेन को देख कर काठियावाड़ी रियासतों की गाड़ी कई दरजे अच्छी थी, ऐसा कहना पड़ता है । रात में उस गाड़ी में कभी बत्ती जलती दिखाई दे, तो अपने को भाग्यवान समझो । रफ़्तार ऐसी कि उसके साथ आदमी भी पैदल दौड़ सके । कुछ युवकों का एक झुण्ड गाड़ी की मन्द गति का लाभ ले कर उसके साथ दौड़ रहा था । कुछ लोग गाड़ी की छत पर चढ़ कर जयघोष के नारे लगाते थे और नीचे से दौड़ने वाले उसको दोहराते थे । बीच – बीच में कुछ लोग जंजीर खींच कर गाड़ी रोक लेते थे । एक जगह गाड़ी बहुत देर तक खड़ी रही तो काका नीचे उतर कर देखने गए । उन्होंने खबर दी कि गाड़ी के साथ दौड़ने वाले एक युवक को पीछे से किसीका धक्का लगा और वह पटरी पर गिरा। दूसरे लोगों ने उसे खींच लिया,फिर भी ट्रेन का एक चक्का उसके पैर पर से निकल गया । गार्ड के डिब्बे में उसे रखा गया । मुजफ़्फ़रपुर के अस्पताल में उसे ले जा रहे थे । काका ने कहा,’मैं उससे मिलकर आया हूँ । दोनों पाँव पर से गाड़ी का पहिया जाने के कारण घुटने तक के पाँव करीब -करीब कट गए हैं । उसके बचने की उम्मीद नहीं है । खून बहुत गया है । फिर भी लड़का होश में था । मैंने उसके सामने उस दुर्घटना के लिए अफ़सोस प्रकट किया तो लड़का कहने लगा,’ उसमें अफ़सोस करने की क्या बात है? गांधीजी की गाड़ी के नीचे मैं कुचला गया,यह तो मेरा अहोभाग्य ही कहना चाहिए ।’

    काका की आँखें डबडबा गईं थीं । उन्होंने कहा, ‘ क्या उसके जितनी भक्ति हममें होगी ?’

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s