हर्ष शोक का बँटवारा

जीवन के प्रारम्भिक काल के ( सात – आठ वर्ष के ) कितने प्रसंग मनुष्य को याद रहते होंगे ? मुश्किल से उंगलियों पर गिनने जितने . लेकिन इन्हीं सात – आठ वर्षों में जीवन के अधिकांश संस्कार उसके मानस – पटल पर अंकित होते हैं . इन वर्षों का असर कृष्णपक्ष की रात्रि के समान होता है . कृष्णपक्ष में किसी एक चन्द्रमा की प्रभा नहीं होती , बल्कि लाखों छोटी- बड़ी तारिकाओं की आभा छायी रहती है . वह रात देखकर हमारी आंखों में चन्द्र की चांदनी नहीं भर जाती , बल्कि इन सब तारिकाओं से आकाश में चित्रित एक रंगोली की आभा छा जाती है .

    मेरे जीवन के प्रारम्भ के सात – आठ सालों ( १९२४ से १९३२ ) की जो छाप मेरे मानस पर बनी है , वह भी इस कृष्णपक्ष के नभोमण्डल जैसी ही है . हां , इतना जरूर है उसमें कहीं – कहीं बापू जैसे चन्द्र – सूर्य की तेजस्विता है , तो कहीं – कहीं मेरे पिताजी या नरहरीभाई जैसे गुरु – शुक्र की अलग चमक भी है , लेकिन इन सबसे बढ़कर कहीं अधिक गहरी छाप उन अग्यात तारिकाओं और नीहारिकाओं से भरी आकाशगंगाओं की है , जो बापू के नभोमण्डल में सदा शोभायमान रहती थी . इसमें कोई एक तारा विशेष पात्र नहीं बना है , बल्कि अनगिनत तारिकाओं का मिला – जुला असर है . ऐसी एक – दूसरी में एकरूप हो जानेवाली उन रात्रियों की इस रंगोली को पृथक – पृथक पंक्तियों में रखने का मैं प्रयत्न करता हूं , तब उनमें से दो रंग विशेष रूप से प्रकट होते हैं . मानव की मन:सृष्टि के दो सनातन रंग : एक आनन्दोल्लास का और दूसरा गहरे विषाद का . बापूजी के आश्रम में जिन अनेक प्रसंगों का अनुभव मुझे हुआ , उनमें इन दोनों प्रकार की छाप है . बहुत दफ़ा तो हर्ष – विषाद की यह छाप एक – दूसरे में मिल गयी-सी लगती हैं . फिर भी सहूलियत की दृष्टि से यहां उनका अलग – अलग वर्णन करूंगा .

    हर्ष की छाप के प्रतीक आश्रम के उत्सव थे और विषाद की छाप के प्रतीक थे उन दिनों के मृत्यु – प्रसंग .

    शैशवावस्था अपने में ही जीवन के प्रत्येक क्षण में हर्ष का कुंकुम घोल देती है . फिर भी यहां तो बीसियों बालक की कुलबुलाहट से गूंजता घोंसला , कलकल करती हुई साबरमती नदी , जीवन का आनन्द लूटने और लुटानेवाले काकासाहब जैसे आचार्य , सत्याग्रह के शुष्क वातावरण में भी ‘ चित्रांगदा और विदाय अभिशाप ‘ को गुजराती में लानेवाले रसिक बुजुर्ग की गोद और पन्डित खरे के स्वर , जो स्वयं मानो भक्ति और संगीत के संयुक्त अवतार थे . फिर पूछना ही क्या !

    आश्रम के उत्सवों को याद करने बैठता हूँ तो सारा बाल्य – काल एक समूचा उत्सव बनकर आंखों के सामने खड़ा हो जाता है . उनमें भी मुख्यतया गोकुल – अष्टमी विशेष रूप से याद आती है , जब आश्रम के सारे लोग एक साथ मिलकर भगवद्गीता का सहपरायण करते थे . हमसे उम्र में पांच – सात साल बड़े लड़के – लड़कियां – रामभाऊ , मथुरी , कनु , इन्दु आदि मिलकर शंकराचार्य का गोविन्दपञ्चकम स्तोत्र एक स्वर में गाकर हमें मुग्ध करते थे . सिर पर लाल रंग की पगड़ी और घुटने तक की छोटी सफेद धोटी पहनकर खुले बदन हम बछड़ों को चराने हो लेते थे और वापस आते समय हमारे मुँह दही – मक्खन के बदले गौशाला के बने पेड़ों से भरे रहते थे .

    और स्मृतिपट पर गोकुल – अष्टमी के बगल ही में खड़ी है रामनवमी – तुलसी रामायण के स्वरों से गूँजती हुई . उसमें प्रमुख पात्र थे तोतारामजी , उत्तर – प्रदेश के अपने खेती – विकास को ठेठ फीजी द्वीप तक पहुँचाकर ये भाई आखिर साबरमती – आश्रम में आकर वहाँ की खेती देख रहे हैं . इनके साथ हमारा सम्बन्ध तभी आता था , जब प्रेमाबहन हमारा एक समय का भोजन बन्द करा देतीं . उस दिन इनकी ( यानी आश्रम की ) खेती में घुसकर हम टमाटर , गाजर , मूली तोड़कर खाते थे और कहीं चोर न कहलाये जाएँ , इसलिए उनके मकान की नाली मे मुँह डालकर ‘ तो……ता ‘ करके जोर से चिल्लाकर उनको सूचना देते दे देते थे . मानो चोरी नहीं की , बल्कि डाका डाला हो . कभी – कभी पकड़े जाते तो वे हमें कमरे में बन्द कर देते थे . कमर में भूल से रह गयी टमातर की डलिया कभी – कभी हाथ लग जाती तो उसको फ़ना कर देते थे . टमाटर खा लेने की खुशी हम समय से पहले ही प्रकट कर देते तो हमें वहाँ से हटाकर दूसरे खाली कमरे में बन्द कर दिया जाता था . और उससे अन्त में क्रन्दन के सहारे मुक्ति मिलती . लेकिन रामनवमी के दिन आश्रम के उस परममंगल विभूति की आध्यात्मिक खेती के फल हम बिना माँगे , बिना समझे , चखते थे , जिसकी मिठास उन गाजर – टमाटरों से बहुत गहरी और स्थायी थी , यह आज ध्यान में आता है . ऐसी ही एक रामनवमी के दिन ही तो सूत्र-यग्य ( हर उत्सव को बापू सूत के कोमल धागों से बाँधते ) करते हुए थोड़े क्षणों में विनोबा की आँखों से भक्तियुक्त आँसू टप- टप -टप टपकने लगे थे न !

लेकिन इस तरह के धार्मिक और सामाजिक त्योहारों को भी पीची छोड़ने वाली याद चरखा – जयन्ती ( रेटियो बारस ) की है . बापू के आश्रम में बापू का ही जन्मदिन ? यह कैसा शिष्टाचार ? लेकिन इस जन्मदिन को बापू ने अपना जन्मदिन माना ही नहीं था . यह तो चरखे का जन्मदिन था . इसलिए स्वयं बापू भी हमारे साथ उसी उत्साह से उसमें शरीक हो जाते थे . लोगों से बचने के लिए उस रोज उनको कहीं भाग जाना नहीं पड़ता था और न उस दिन के नाटक का उनको प्रमुख पात्र बनना पड़ता . उस दिन बापूजी एक सामान्य आश्रमवासी की तरह ही रहते थे . कभी हमारी दौड़ की स्पर्धा में समय नोट करने का काम करते  , तो कभी – कभी हमसे बड़े लड़कों के कबड्डी के खेल में हिस्सा लेते . कभी – कभी हम लोगों के साथ साबरमती नदी में ( बाढ़ न हो तब ) तैरते भी थे . शाम को हमें भोजन परोसते  और रात को अन्य आश्रमवासियों की तरह नाटक देखने के लिए प्रेक्षक के रूप में बैठ जाते . उस दिन का प्रमुख पात्र होता था चरखा . चरखा – द्वादशी का दिन गांधी – जयन्ती काभी दिन है , यह तो दो – चार चरखा – द्वादशियों को मनाने के बाद मालूम हुआ .

    आजकल चरखा – द्वादशी के दिन बापू की झोपड़ी या बापू के मन्दिर खद़्ए किये जाते हैं . उनके फोटो की तरह – तरह से पूजाएँ की जाती हैं और सूट की  की अपेक्षा टूटन का ही अधिक प्रदर्शन दिखाई देता है . लेकिन उन दिनों का जो दृश्य मेरी आँखों के सामने आता है , उसमें बापू का फोटो कहीं भी नहीं देखता हूँ . अखण्ड सूत्रयग्य उस समय भी चलते थे . विविध प्रकार के विक्रम ( रेकार्ड )   तोड़ने में हम बच्चों को अपूर्व आनन्द और उत्साह रहता था . कोई सतत आठ घण्टे कात रहा है तो दो साथी एक के बाद एक  करके २४ घण्टे अखण्ड चरखा चालू रखते हैं . दिनभर काते हुए सूत के तारों की संख्या नोट कराने में एक – दूसरे की स्पर्धा चलती . कातते हुए भी अन्त्याक्षरी चलाते रहते . प्रारम्भ हमेशा ‘ रघुपती राघव राजाराम ‘ की धुन से ही होता . उस समय ‘ इइश्वर अल्ला तेरे नाम ‘ का समावेश धुन में नहीं हुआ था . अन्तिम कड़ी पूरी होते – होते ही अन्त्याक्षर से शुरु होनेवाली कविता दूसरा बोल देता था . ‘ आश्रम भजनावलि ‘ का खजाना तो हमारे पास था ही . जो होशियार लड़के थे , वे गीता के ऐसे सब श्लोक याद कर लेते थे कि जिससे प्रतिपक्षी को उस श्लोक के अन्त में कठिन अक्षर का सामना करना पड़े . श्लोकों में शंकराचार्य अय्र भतृहरि के श्लोकों का विशेष प्रयोग होता था . रामायण के दोहे – चौपाइयों का तो बड़ा भण्डार था ही . इन सबके साथ सत्याग्रह – आन्दोलन के बढ़ते हुए चरण के साथ कदम मिलाने वाले गीत भी बीच – बीच में आ जाते . कुछ गीत इस प्रकार के थे :

                              यह सिर जावे तो जावे ,

                               पर आजादी घर आवे .

                                यह जान फ़ना हो जावे ,

                                 पर आजादी घर आवे ..

    और –

                                   चलाओ लाठी चलाओ डण्डा ,

                                   उड़ायेंगे हम अपना झण्डा .

                                   रक्त हमारा नहीं है ठण्डा ,

                        बल्कि अग्नि तरंग – हमारी शुरु हई है जंग..

    या तो

                                   अटूट यह कच्चे सूत का धागा ,

                                   हाँ , उस लोहे की बड़ियों को भी तोड़े-

                                   अटूट यह कच्चे सूत का धागा ..

    इसी तरह जलियाँवाला बाग का स्मरण करानेवाला रतनबहन का गरबा गाया जाता . खुद हिंसा काप्रयोग भले न किया हो , लेकिन आश्रम के गीतों में भगतसिंह का गौरव कम नहीं था .

    आज जब फिल्मी गीतों के बिना अन्त्याक्षरी कैसे खेली जाय , इस परेशानी का अनुभव करनेवाले बच्चों को देखता हूं , तो मुझे अपने पर ही ईर्ष्या होती है .

    इन उत्सवों में आश्रम के भाइयों की अपेक्षा बहनें ही अधिक हिस्सा लेती थीं , ऐसा मेरे मन पर असर है . हरेक उत्सव में उनको अपनी रसोई की कला का प्रदर्शन करने का मौका मिलता था ,ऐसा तो नहीं कहा जा सकता . चरखा – द्वादशी के दिन तो एक ही समय भोजन रहता था . ( मेरे पिताजी हमारे घर में तो इस दिन मिष्टान्न ही खाते . कहते थे , ‘ आज के दिन तो भाई हम अच्छी – अच्छी चीज खायेंगे . अपने को यह कठोर जीवन पसन्द नहीं . ‘ ) शाम को सोमनाथ – छात्रालय के आँगन में सब साथ खाने बैठते तो भी फलाहार ही मिलता था . लेकिन उस केले , खजूर और मूँगफली परोसने में भी आश्रम की बहनों को का उत्साह कुछ और ही था . रात के नाटक में लड़कों के जितनी ही संख्या लड़कियों की होती थी . रास-क्रीड़ा में दोनों साथ होते . किन्तु गरबा उनके अलग होते थे . मेरे मन पर सबसे अधिक छाप आश्रम की बड़ी बहनों की भक्ति की थी . उत्सव – स्थानों को सजाने में और अन्य प्रकार से भी वह प्रकट होती थी .  लक्षमीबहन खरे के घर में सुबह से ही पारिजात के फूलों का ढेर जमा हो जाता था . फिर मालाएँ बनाना शुरु हो जाता . आश्रम की सब बहनों में एक बहन की मूर्ति आँखों के सामने विशेष रूप से आती है . वह है काशी बहन गाँधी की . काशी के उच्चारण मात्र से किसी सनातनी हिन्दू के मन में जो पवित्र भावना जाग उठती है , उतनी ही पवित्र भावना काशीमौसी के स्मरण से मेरे मन उठती है . बुढ़ापे में उत्तर – पश्चिमी सीमाप्रान्त के पैर फल जितनी सहज मधुरता से गाये हुए उनके स्वर कान मे गूँजते थे .

                           ” ठुमुकि चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ ”

     मुझे विश्वास है कि काशीमौसी यह गीत गाते समय भगवान रामचन्द्र की वह बालमूर्ति अपने मानस – मन्दिर में देखती होगी , जो अपने नन्हें पाँवओं पर चलते समय बीच – बीच में जमीन पर गिर पड़ती हो . क्योंकि रामजी की सेना के सिपाही जैसे हम बच्चे अपने हृदय में माता कौशल्या जैसा प्यार काशीमौसी से पाते थे .

    काशीमौसी की तरह दूसरी याद बड़ी बहन गंगाबहन (वैद्य ) की है .  उनकी यूनानी दवाओं की अपेक्षा उनकी मीठी वाणी ही हमारे मन पर अधिक असर कर जाती थी . बंगाल की बाढ़ – पीडितों की मदद में एक दिन आश्रम में सब लोगों श्रमदान किया . मैं सबसे छोटा था . मुझे कौन काम देगा ? गंगाबहन ने मुझे अपनी शीशियाँ धोने का काम दिया और दो आने दिये . मेरे जीवन की वह प्र्थम कमाई थी .उस समय अन्य लोगों की तरह मुह्जे भी लगा कि मुह्जे जो मजदूरी मिली , वह मेरे काम की तुलना में गंगाबहन के लाड़ के कारण ही अधिक मिली थी .

    मृत्यु का प्रथम दर्शन मुझे मेरे लँगोटिया यार वसन्त खरे की मृत्यु के रूप में हुआ . उसके पिता बचपन में हमारे लेखक थे , तो वसन्त हमारा पठक था . था तो वह मुझसे ग्यारह महीने ही बड़ा , लेकिन उसने पढ़ने में बहुत प्रगति कर ली थी . इसलिए वह रोज पास बैठाकर ‘ ईसप नीति ‘ में से कथाएँ पढ़कर सुनाता था . एक दिन अचानक उसको बुखार चढ़ा . बुखार तो कैयों को चढ़ता है , उस समय भी दूसरे लोगों को बुखार चढ़ा था . लेकिन दूसरे लोगों की माता बुखार में बाहर फूट निकली थी , वसन्त की माता अन्दर ही अन्दर दबी रही , जिसके कारण वह भगवान की गोद में चला गया . हम कुछ समझ ही नहीं पाये . पण्डितजी ने अपनी व्यथा प्रार्थना के भजनों रूप में प्रवाहित की . आई ( स्व. लक्ष्मीबहन खरे ) के लिए वह भी सम्भव नही था . क्योंकि उनकी लड़की मथुरी भी चेचक से बिस्तर में पद़्ई थी . हम गाये भी नहीं और रोए भी नहीं . लेकिन उस समय से मृत्यु हृदय में ऐसा घर कर गयी है कि जब कभी किसी की मृत्यु देखता हूं तो वसन्त ही नज़र के सामने आता है .

 उस वर्ष माता की बीमारी ने आश्रम के तीन बालकों का बलिदान लिया . पण्डितजी का लड़का वसन्त , मथुरादासभाई का लड़का मेघजी और भगवानजीभाई की लड़की गीता .  पू. इमाम साहब का इन्तकाल भी इसी बीच हुआ था . मगनलाल काका और रसिक गाँधी इनसे पहले गये . ऐसे मौकों पर पण्डितजी जैसे सन्त आनन्दघन का “ अब हम अमर भये , न मरेंगे ” यह गाते या फिर ” मंगल मन्दिर खोलो” गाते . प्रार्थना के बाद बापू कुछ बोलते भी थे . लेकिन उस प्रवचन की अपेक्षा बापू का मरनेवालों के स्वजनों को अपने पास बिठा लेना अधिक मह्त्व का होता था . मगनलाल काका गये उस दिन तो अपना मौन भी शायद तोड़ा था . दूसरे भी एक प्रसंग पर उन्होंने अपना साप्ताहिक मौन तोड़ा था  . लेकिन वह प्रसंग कालक्रम के अनुसार बाद में आता है , इसलिए उसका जिक्र बाद में करूँगा .

    मरनेवालों के स्वजनों को अपने पास बैठाकर बापू मानो उनकी सारी वेदना अपनी वेदना बना लेते थे . ऐसे प्रसंगों पर बापू यदि प्रवास पर हों तो हर रोज उनको पत्र लिखते .

    और अकेले बापू ही क्यों ? उनके आश्रम में किसीका भी दुख उसका अकेले का नहीं होता था . इमाम साहब के चल बसने के बाद अमीनाबहन मेरी माँ की विषेष लाड़ली बन गयीं  थी . वसन्त की मृत्यु के बाद पण्डितजी की गोद में बैठने और मथुरी के हाथ से सिर में तेल की मालिश कराने का वसन्त का स्थान मुझे ही प्राप्त हो गया , ऐसा मुझे लगा . अरे ! आश्रम में ‘लंकापति’ कुत्ता मर गया तो उसका शोक भी हममें से क-इयो को एक -सा हुआ था .

  आश्रम के उत्सव और आश्रम के मरण अन्य सब दृष्टियों से उत्तर – दक्षिण ध्रुव जितने अलग – अलग थे , लेकिन एक बात में वे समान थे . हर्ष हो या विषाद , दुख हो या सुख , आश्रम में इनका बँटवारा सबके साथ होता था . 

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