पूरे प्रेमीजन रे

बापू की लड़ाई की पद्धति का मुझे बचपन में ही अनुभव हो गया था . प्रसंग इस प्रकार था :

    शान्तिकुमार नरोत्तम मोरारजी ने बम्बई से मेरे लिए किसीके हाथ कुछ खिलौने भेजे थे . काका ( मेरे पिताजी ) जहां जाते , वहां उनके मित्र हो ही जाते थे . किन्तु उनमें से कुछ की मित्रता घनिष्ठ हो जाती . काका के साथ जिनकी घनिष्ठ मित्रता हो जाती , उनका हमारे साथ भी घरेलू सम्बन्ध जुड़ जाता था . शान्तिकुमारजी का बापू की तरह काका से घनिष्ठ सम्बन्ध था . इसलिए ये खिलौने उन्होंने मेरे लिए भेजे . साबरमती – आश्रम में यों तो खेलने को बहुत मिल जाता था , लेकिन खिलौने हमेशा नही मिलते थे . हमारे दुर्भाग्य से शान्तिकुमारजी के भेजे हुए खिलौने विदेशी थे . इसलिये हमारे पास पहुंचने के पहले ही बापू ने उन पर कब्जा कर लिया था . बापू ने अपने कमरे में दराज पर उनको रखवा दिया था . हमारी ‘ खूफिया – पुलिस ‘ को पता चल गया कि बाबला के लिए बम्बई से आये खिलौने बापूजी ने छिपाकर रखे हैं . ऐसे सरासर अन्याय के खिलाफ़ लड़ने के लिए हम लोगों ने तैयारियां शुरु कर दीं . कांग्रेस – युग का अनुकरण करते हुए लड़ाई का पहला कदम अपना प्रतिनिधि भेजकर उठाया जाय , ऐसा तय किया गया . खिलौने मेरे नाम से आये थे , इसलिए हमारे बाल – प्रतिनिधि – मण्डल की ओर से मुझे ही प्रवक्ता के रूप में चुना गया .

    उन दिनों बापू मगनकुटी में रहते थे . नित्य की तरह मेरे पिताजी बापू की बगल में बैठकर कुछ लिख रहे थे . दूसरे भी कुछ अन्तेवासी बापू के अगल – बगल बैठे थे . मोटी बा ( कस्तूरबा ) वहीं पर थीं . हमारा प्रतिनिधिमण्डल वहां जा पहुंचा .

    मैंने ही पहला वार किया , ‘ मेरे लिये बम्बई से खिलौने आये हैं , यह बात सही है ? ‘

    लड़ाई की शुरुआत में ही प्रतिपक्षी से सत्य को स्वीकार करा लेना उपयोगी होता है . बापू भी उस समय कुछ लिखने में मशगूल थे . लेकिन उन्होंने कागज पर से दृष्टि उठा कर मेरी तरफ देखा और कहा और कहा , ‘ कौन ? बाबला ? हां खिलौने के बारे में तूने जो सुना है , वह सही है . ‘

    ‘ मेरे खिलौने कहां हैं ? ‘ मेरे दूसरे प्रहार के पीछे बरामद माल का ठिकाना जानने की उत्सुकता थी , क्योंकि हमारे पास खबर पहुंची थी कि बापू ने खिलौने कहीं छिपा रखे हैं .

    ‘ वे रहे खिलौने दराज पर ‘ बापू ने उंगली से इशारा किया . तो , बरामद माल छिपा कर नहीं रखा था . अच्छी खासी डलियाभर खिलौने थे और सुन्दर इतने कि देखकर मुंह में पानी भर जाय !

   ’ ये खिलौने हमें सौंप दीजिये ‘ न्याय अपने साथ हो तो घुमा – फिरा कर बात करने की क्या आवश्यकता ? सीधे न्याय की मांग क्यों न की जाय ?

     तब बापू ने अपनी बात पेश की , ‘ तुझे मालूम है न कि ये खिलौने विदेशी हैं ? ‘ आश्रम तो स्वदेशी – आन्दोलन का पीठ – सा था . तो वहां के बच्चे विदेशी खिलौनों से कैसे खेल सकते हैं ? बापू को यह बात कहनी थी . लेकिन हम बच्चे उनकी बात समझने को राजी हों तब न ?

    ‘ स्वदेशी – विदेशी मैं कुछ नही जानता . मैं इतना जानता हूं कि खिलौने मेरे हैं . मेरे लिये वे भेजे गये हैं , इसलिये मुझे मिलने चाहिए ‘ मैंने अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए कहा . मुझे विश्वास था कि बापू मेरे अधिकार से इनकार नहीं कर सकेंगे . लेकिन बापू ने बात को ऐसा मोड़ दे दिया , जिसकी हमने कल्पना ही नही की थी .

    ‘ हम क्या विदेशी खिलौनों से खेलेंगे ? ‘ 

    हिन्दी ‘ हम ‘ शब्द में मैं का बहुवचन का अर्थ है . साथ – साथ ‘तू’ और ‘मैं’ का संग्रहवाचक भी वह शब्द है . लेकिन गुजराती में ‘आपणे’ शब्द में ‘तू’ और मैं यही भाव व्यक्त होता है . ‘मैं’ के बहुवचन के लिये गुजराती में ‘अमे’ शब्द अलग से है .

    और इस ‘आपणे’ शब्द में मानो बापू का ब्रह्मास्त्र भरा था . एक ही वाक्य में उन्होंने खुद को और मुझ को एक पक्ष का बना दिया . हम कमर कस कर लड़ने आये थे . कहां गया वह आवेश ? कहां गया वह प्रतिनिधिमण्डल ? कहां गयी वह आमने – सामने वागयुद्ध की वह तैयारी ? जब दुश्मन खुद ही मित्रपक्ष बन जाय , वहां युद्ध की तुला ही डगमगाने लगे तो क्या आश्चर्य !

    इन खिलौनों से खेलने का अपना अधिकार मुझसे छीना जा रहा था , लेकिन उनसे खेलने का अपना अधिकार भी तो बापू छोड़ रहे थे . तभी तो उन्होंने ‘हम’ कहा !

    और जब अधिकार केवल मेरा ही नहीं , बल्कि प्रतिपक्षी का भी है , यह बात ध्यान में आती है , तब अधिकार की जगह कर्तव्य – भावना का उदय हो जाता है .

    ‘विदेशी वस्तुओं के खिलाफ़ हम आन्दोलन चला रहे हैं’ और हमारे ही घर में विदेशी खिलौनों से खेला जाएगा ? ‘ बापू के सामने दलील करने या उन्हें समझाने की जरूरत ही नहीं रह गयी , प्रतिनिधिमण्डल के प्रवक्ता को ही परास्त होते देखकर मण्डल के दूसरे सदस्य चुपचाप खिसक रहे थे .

    विख्यात बाल – मनोवैग्यानिक नील का कहना है कि ‘ किसीका पक्ष लेना ‘ यही प्रेम करने की व्याख्या कही जा सकती है . ‘ इस स्थूल व्याख्या के अनुसार भी बापू को हमने अपने प्रेमीजन के रूप में देखा है

सत्याग्रह – आश्रम में भी पाठशाला थी . लेकिन कु. प्रेमाबहन कंटक हम लोगों को पढ़ाने आने लगीं , तब तक उसका हमें भान ही नही था . प्रेमाबहन के आने के कारण हमें पाठशाला के अस्तित्व का भान हुआ . पढ़ाने के काम में वे बहुत उत्साही थीं . आज मुझे उनके नाम के पूर्वार्ध का भी पर्याप्त अनुभव हुआ है . उन दिनों हम उनके नाम के उत्तरार्ध को ही सही मानते थे . हमारी इच्छा हो या न हो , वह पढ़ाये बगैर नहीं छोड़तीं . इस घटना के पांच – सात वर्ष बाद १९३७ में वर्धा में शिक्षा – शास्त्रियों के सामने बापू ने जब नयी तालीम के सम्बन्ध में विचार रखे , तब कई शिक्षा – शास्त्रियों ने कहा कि बापू के विचार में कोई नयी बात नहीं है . यदि मैं गलती नही कर रहा हूं , तो नागपुर की तरफ के एक शिक्षक ने तो यहां तक कह दिया कि ‘ ग्यान के साथ हाथ का उपयोग करने के विचार का अमल तो मैं पहले से ही करता आया हूं . बच्चे मेरे काबू में नहीं रहते हैं , तब छड़ी का उपयोग करके ग्यान के साथ हाथ का अनुबन्ध मैं करता हूं . ‘ नागपुर की तरफ के शिक्षक की नयी तालीम की यह व्याख्या प्रेमाबहन शायद बम्बई , पूना से सीखकर आयी होंगी . जब से हम उनके हाथ सौंपे गये , तब से वह भी ग्यानवर्धन के लिये अपने हाथों का प्रयोग हम पर करती थीं .

    ‘ उनके पास तो सीखना ही नहीं ‘ इस निश्चय को हम सत्याग्रही की तरह निभाते थे . कुछ – न – कुछ छोटे – बड़े प्रसंगों का निमित्त करके हम वर्ग में से या उद्योग में से गायब रहते थे . लेकिन ऐसा करते हुए जब हम पकड़े जाते , तब प्रेमाबहन तरह – तरह से सजाएं देतीं . उसमें एक समय का खाना बन्द करवाने की सजा तो आम हो गयी थी . लेकिन उपवासवीर बापू के आश्रम में एक समय का भोजन छोड़ना कोई नयी बात थोड़े ही थी . इसकी पूर्ती हम लोग आश्रम के खेतों के टमाटर आदि फल भरपेट खाकर फलाहार से कर लेते थे .

    ‘ छुट्टी मनाने ‘ का ऐसा ही एक प्रसंग था . बारिश हुई थी . सभी ऋतुओं में वर्षा ऋतु ही ऐसी कि गाती – बजाती आकर , अपने अस्तित्व का परिचय कराती है .  आश्रम में जगह – जगह छोटे – बड़े गड्ढों में पानी भर गया था . मैं घर से निकला तो था वर्ग के में जाने के लिए , लेकिन रास्ते में रीठे के पेड़ के नीचे एक डबरा मिल गया . उसमें छोटे – छोटे कीड़ों को डूबकर मरते देखा तो मेरे अन्दर का ‘ दीनबन्धु ‘ जाग उठा . पाठशाला में जाने के बदले इन उत्पीडित पिपीलिकाओं का उद्धार करने की मैंने ठान ली . रीठे का एक पत्ता लेकर उस से एक चीटी को किनारे पर रखा . एक ही चीटी क्यों ? एक साथ सब क्यों नहीं ? एक – एक करके सब चीटियों को उबार लेने की योजना थी . इस पद्धति में डबरे में डूबनेवाली चीटियों के उद्धार के साथ वर्ग के वातावरण में डूबनेवाले बाबला का भी उद्धार था .

    लेकिन इतनी आसानी से हार मान जांए तो वह प्रेमाबहन कैसी ? वर्ग में सौ फीसदी उपस्थिति होनी चाहिए , यह उनका आग्रह रहता था . इस आग्रह की पूर्ति के लिए वह सारे आश्रम का चक्कर लगा कर आ जातीं . पिपीलिकोद्धार के पुण्य कार्य में मैं एकचित्त हो गया था . तब रीठे के पेड के पीछे से आकर प्रेमाबहन ने मेरा कान पकड़ लिया . यहां गजग्राह की लड़ाई का प्रसंग नहीं बना और मैं भीगी बिल्ली की तरह प्रेमाबहन के साथ चल दिया . पता नहीं उनको क्यों मेरे कान से इतना प्यार हो गया कि वर्ग में पहुंचने तक उनके हाथों ने मेरे कान का सत्संग किया .

    उन दिनों बापू आश्रम में नहीं थे , इसलिए मैंने उनको एक पत्र लिखा . लिखा नहीं , लिखवाया . क्योंकि पत्र लिखना सीखें इसके बहुत पहले से बापू के साथ हमारा पत्र – व्यवहार चलता था . पण्डित खरे हम सबकी ओर से पत्र लिख देते और बापूजी कागज के टुकड़ों पर अपने हाथ से सबको जवाब लिखते . इस व्यवस्था के अनुसार मैंने बापूजी को पत्र लिखकर रीठे के पेड़ के नीचे जो घटना घटी , उसकी शिकायत दर्ज कर दी और यह भी पूछा कि ‘ आप अहिंसा में विश्वास रखते हैं फिर आपके आश्रम में ऐसी हिंसा क्यों ? ‘ जारी

    किसी प्रसंग के उचित या अनुचित होने के सम्बन्ध में दो रायें हो सकती हैं . यह हो सकता है कि आज वह प्रसंग मुझे जिस तरह याद आता है , उससे भिन्न प्रकार से प्रेमाबहन को याद आयेगा . लेकिन इतनी बात पक्की है कि बड़ों के साथ हम बच्चों का झगड़ा हो जाय , तो बापू हम लोगों के पक्ष में रहते थे . कुछ दिन बाद प्रेमाबहन को बापू ने पत्र लिखा . पत्र में क्या लिखा था मैं नही जानता . लेकिन इतना जानता हूं कि उसके बाद से ताड़न का प्रयोग हमेशा के लिए समाप्त हो गया .

     इस तरह बापू द्वारा मेरा पक्ष लेने के और भी प्रसंग याद आते हैं . यथास्थान उनका जिक्र करूंगा . अभी तो पण्डित खरे के मार्फत पत्र लिखवाने के समय का ही एक और प्रसंग याद आ रहा है . उसको दिये देता हूं .

    हर सप्ताह हम पत्र लिखते थे . उसमें आम तौर पर बापू से एक प्रश्न ही पूछते थे . सप्ताह में एक बार बापूजी का जवाब अवश्य मिल जाता था . जिस सप्ताह में जिसने प्रश्न पूछा होगा , वह बापू का जवाब जानने के लिए बड़ा उत्सुक रहता था . उसमें भी कौन अच्छी तरह प्रश्न पूछता है और बापू ने किसको कितना लम्बा जवाब दिया , यह भी स्पर्धा का विषय रहता था . मनुष्य के मन  से ही स्पर्धा समाप्त नही होती , तब तक आश्रम से वह कैसे समाप्त हो सकती थी .

    एक सप्ताह मैंने प्रश्न पूछा , ‘ बापूजी , हम इतने सारे बच्चे आपको इतने सारे प्रश्न पूछते हैं , लेकिन आप तो छोटे-से कागज के टुकडे पर जवाब लिख देते हैं . आश्रम में हम गीता कंठस्थ करते हैं . उसमें देखते हैं कि अर्जुन एक छोटा -सा प्रश्न पू्छता है और भगवान उत्तर में पूरा अध्याय बोल जाते हैं . फिर आप क्यों छोटा-सा जवाब देते हैं ?’

    इस प्रश्न की बड़ों ने प्रशंसा की , तो मुझे भी लगा कि यह बड़ा अहम सवाल मैंने उठाया है . इसके उत्तर की मैं बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगा .

    अपने छोटे पत्रों में भी सम्बोधनों का चुनाव करते समय बापूजी किसी नये प्रेमी के जितनी भावना भर देते थे . इस तरह मुझे भी कई प्रकार के सम्बोधन मिल चुके थे . ‘चि.बाबा’ से लेकर ‘चि. नारायण राव’ तक . इस बार भी ऐसे ही कुछ सम्बोधन का उपयोग बापू ने किया था . बदकिस्मती से वह पत्र आज मेरे संग्रह में नहीं है . लेकिन श्रुति भले न हो , स्मृति तो है ही .

    बापू ने लिखा था , ‘तेरा प्रश्न अच्छा है . लेकिन इतना ध्यान में रख कि श्रीकृष्ण को तो एक ही अर्जुन था . मेरे लिए तो तेरे जैसे कई अर्जुन हैं न ? ‘

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