प्रभात किरणें

कुछ समय के लिए बापू ने साबरमती के सत्याग्रह आश्रम का नाम बदलकर ‘ उद्योग – मन्दिर ‘ रखा था . ‘ सत्याग्रह – आश्रम ‘ नाम शायद भारी मालूम हुआ हो . ‘ उद्योग मन्दिर ‘ नाम उससे कम महत्वाकांक्षावाला और अधिक वास्तववादी कहा जाएगा . फिर भी संस्कृत भाषा और बापू की पसन्दगी , दोनों में यह खूबी थी कि ‘ आश्रम ‘ शब्द में ‘ श्रम ‘ शब्द था और ( मन्दिर को छोड़ दें तो भी ) ‘ उद्योग ‘ में योग शब्द था ही .

    आश्रम के एक स्थान का मूल नाम कायम रहा था – प्रार्थना – भूमि . आज जिसको उपासना – भूमि कहा जाता है , उस स्थान को सत्याग्रह – आश्रम से छोटी संग्य़ा बापू दे नहीं सके .

    कैसे दे सकते थे ? सत्याग्रह के विचार का जन्म ही प्रार्थना की भूमिका में से हुआ था . उस स्थान पर बापू का सत्याग्रही जीवन सोलह कलाओं से प्रकट होता था . प्रार्थना में जब केवल आश्रमवासे रहते , तब उनके एक – एक प्रश्नों को ले कर सत्याग्रही के नाते उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए , इस सम्बन्ध में बापू मार्गदर्शन करते थे . उनके विचार में सत्याग्रह महज अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ने का शस्त्र नहीं था . सत्याग्रह तो सत्य की खोज करनेवाले की सपूर्ण जीवन – पद्धति थी . इसीलिए जीवन के हर पहलू की परीक्षा प्रार्थना – भूमि में सत्याग्रह की कसौटी पर की जाती थी . उठने में देर क्यों हो जाती है ? प्रार्थना में झपकी क्यों लग जाती है ? स्वप्नदोष क कारण क्या है ? क्या क्रोध दु:साध्य रोग है ? क्या आश्रमवासियोंको जेवरों की आवश्यकता है ? आहार का परिणाम मन पर कितना कितना होता है ? इत्यादि कई व्यक्तिगत प्रश्नों की छानबीन बापू प्रार्थना के बाद करते थे .  इसी भूमि पर से बापू ने गीता पर प्रवचन भी किए थे . और दाण्डीकूच के समय लोगोंकी भारी भीड़ के कारण उपासना – भूमि की जगह छोटी पड़ी , तो साबरमती नदी के विशाल रेतीले तट का उपयोग करना पड़ा . पण्डित खरे की सागर – गम्भीर संगीत – ध्वनि , जो जड़ को भी दोलायमान करनेवाली थी , उस समय की मेदिनी के सामने अपर्याप्त साबित हुई .

    स्थल भी कितना रमणीय था ! एक ओर हृदयकुंज , दूसरी ओर दत्त – मन्दिर , तीसरी ओर वह नदी ,जो गरमी के मौसम में अन्त:स्रोता फलगू की तरह रुक्ष रेतेली , तो बारिश में तूफ़ानी बाढ़ से घों – घों करनेवाली , लेकिन बारहों मास उपासना – भूमि का पद – प्रक्षालन करते हुए अखण्ड बहती हुई साबरमती नदी !

    लेकिन इस प्रार्थना – भूमि के साथ मेरे बचपन के संस्मरण ( ४ से ७ वर्ष की उम्र तक के ) जाड़े के दिनों में उस भूमि पर क्रीड़ा करते हुए चकवे , मैना और मोरों की तरह ही खिलवाड़वाले हैं .

    बापू उत्तर की ओर के पेड़ के नीचे बैठते थे . बापू की एक ओर  बहनें और दूसरी ओर भाई बैठते थे . मैं प्रार्थना में जाने लगा , तब से ही मैंने अपना स्थान खोज लिया था . बहनों या भाइयों की पांत में बैठने के बदले मैंने बापू की गोद में बैठना शुरु किया . उस तथ्य के बारे में आज सोचता हूं तो लगता है कि वह कितना बड़ा भाग्य था और साथ ही कितनी जिम्मेदारियों से भरा था . लेकिन उस समय वहां जाकर बैठने का कारण शायद यही था कि सारी प्रार्थना का , आश्रम का और हमारी सारी दुनिया का केन्द्रस्थान बापू की गोद थी .

    कुछ दिनों बाद मेरा एक प्रतिस्पर्धी खडा हुआ . भाई प्रबोध चौकसी आश्रम में अपने नाना के पास कुछ दिन रहने आया . तब वह भी बापू की गोद में बैठने लगा . तब तक आश्रम में सब बच्चों में छोटा मैं ही था . लेकिन प्रबोध मुझसे भी छोटा था . इसलिए उसका हक नामंजूर हो ही नहीं सकता था . हम दोनों को अगल – बगल बैठाकर बापू ने समस्या का हल निकाल लिया .

    लेकिन कुछ दिनों बाद बढ़ती हुई और हमें सबके साथ प्रार्थना में ठीक ढंग से बैठने को कहा गया . हम बच्चे दोनों तरफ़ का लाभ उठाते . कभी भाइयों की कतार में बैठते तो किसी व्यक्ति-विशेष को चुनकर उनकी नकल करने में अपनी सारी सारी एकाग्रता का उपयोग करते थे . जब बहनों की कतार में बैठते तो भगवान के साथ तद्रूप बनने की इच्छा रखनेवाली साथ – साथ बैठी दो बहनों की चोटियां धीरे से जोड़ देने में हम सार्थकता का अनुभव करते थे .

    क्या आश्रम में एक भी बात ऐसी होती होगी , जो बापू के पास न पहुंचे ? ‘ बापू, आज खजूर का आधा फल अधिक खाया गया’, ‘गरम पानी से नहाना अच्छा या ठंडे पानी से?’ इत्यादि अनेक बातों का निर्णय बापू के द्वारा होता था . फिर हमारा यह नटखटपन तो शिकायत करने लायक था . उसको बापू के पास पहुंचने में देर ही क्या थी ? ‘ बापू यह बाबला ,धीरू और धर्मकुमार प्रार्थना के समय हमें सताते हैं . ‘

    हम मन में सोचते कि अब अदालत बैठेगी और वकील , गवाहों की जरूरत पड़ेगी . असहयोगियों की तरह हम अपना गुनाह सीधे – सीधे स्वीकार कर लें तो कैसा रहेगा ?

    लेकिन हमें अधिक देर इस सम्बन्ध में माथापच्ची नहीं करनी पड़ी . हमसे जवाबतलब न करते हुए बापू ने कह दिया कि ‘ अपनी प्रार्थना में इन बच्चों को क्या रस आता होगा ? उनके लिए अलग प्रार्थना की व्यवस्था करो . ‘

    मन में था वही मानो बैद ने बता दिया . लेकिन सच कहूं ? हमारी प्रार्थना में और क्या होता था यह तो आज याद नहीं है , लेकिन इतना जरूर याद है कि प्रार्थना के अन्त में रामायण की कथा सुनाई जाती थी . इसमें भी किष्किन्धा-काण्ड और लंका-काण्ड को छोड़ और कुछ भी याद नहीं है ,यह भगवान की कसम खा कर कह सकता हूं . रात को हम प्रार्थना में जो भी सुनते थे या बोलते थे ,उसकी छाप हमारे दैनन्दिन जीवन पर बड़ों की अपेक्षा अधिक जल्दी और गहरी पड़ती थी . मेरी मां पर उस समय आश्रम के कोठार ( भण्डार ) की किम्मेवारी थी . इससे पहले जिन भाइयों ने कोठार संभाला था, उनकी हर रोज हिसाब में कुछ-न-कुछ भूल रह जाती थी. लेकिन जब से बहनों ने काम संभाला,हिसाब बिलकुल ठीक मिल जाता था, इसकी मेरी मां को साभिमान खुशी थी .इसमें काम बहुत करना पड़ता था . एक दिन मां थकी-मांदी बड़ी देर से कोठार से आ रही थी कि आनन्द-निवास के फाटक के पास उसने बाबला को अलकतरा से हाथ-मुंह काला किये बड़े ठाठ के साथ बैठे देखा .

    ‘ हाय राम , यह तूने क्या किया ?’ मां ने अकुलाकर कहा .

    छोटे-छोटे चीथड़ों को एक – दूसरे से बांधकर लंकापति रावण के सिंहासन जितनी लंबी बनायी हुई लंगोटी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा , ‘ मारुति बना हूं,मारुति’ .

    यों तो बापू को हमारा यह नटखटपन अच्छा लगता था, बल्कि कभी मौका पा कर बापू हमारे साथ  खेल भी लेते थे .  लेकिन कभी – कभी वे हम पर दूसरी शिक्षा – पद्धति का भी प्रयोग करते थे और उसमें सफल भी होते थे . जो कोई सुबह देर से उठता था,उसको उठने की घण्टी बजाने का काम सौंपना यह बापू का इलाज सबको मालूम हो गया था .इसी तरह हमें कुछ-न-कुछ जिम्मेवारी का काम सौंपकर हमारे उत्साह और उधम को लगाम लगाने का काम बापू करते थे

बापू का आश्रम देखने आनेवालों की कमी तो थी नहीं . इन दर्शकों को देखकर कईबार उनका मजाक करने का जी होता था . एक बार एक अतिथी आये . वे आश्रम के व्यवस्थापक श्री नारणदासभाई का घर तलाश रहे थे . हम बच्चों में से किसी एक ने उनको पाखाने का रास्ता बता दिया . शायद ऐसे ही किसी कारण से मुझे एक अमेरिकन महिला को आश्रम दिखाने का काम सौंपा गया . एक बार जिम्मेदारी सौप दी , तो फिर हम उस काम आनाकानी नहीं करते थे . मैंने उस महिला को सब तरफ घुमा कर आश्रम दिखा दिया . उसके साथ के दुभाषिये की मदद से आश्रम में क्या काम चलता है , उसकी सारी जानकारी भी अपनी बुद्धी के अनुसार दे दी . एक कमरे में चक्की देख कर उस महिला को बड़ा अचरज हुआ ,लेकिन मुझे उससे भी ज्यादा अचरज यह जानकर हुआ कि इस बहन ने अब तक चक्की नहीं देखी है . मैंने चक्की चलाकर उसकी खूबी बताई . वह बहन खुश हो गयी और तुरन्त उसने मेरा फोटो उतार लिया . हम वहां से आगे बढ़े , तो उस बहन ने मुझे दो आने देने चाहे . मैंने लेने से इन्कार किया . उस बहन ने बहुत आग्रह किया , लेकिन मैं टस से मस नही हुआ . ‘यह तो खुश हो कर देना चाहती है , इसलिए ले लो ‘ दुभाषिये ने मुझे समझाने की कोशिश की . मैंने दुभाषिये से कहा , ‘ मैं पैसे के लिए इस बहन को आश्रम नहीं दिखा रहा हूं . बापू ने यह काम मुझे सौंपा , इसलिए कर रहा हूं . आपको पैसा देना हो तो आश्रम के व्यवस्थापक को दीजिये . मैं नहीं ले सकता . ‘
समाजशास्त्र का यह पाठ मुझे किसीने कभी सिखाया हो , यह याद नहीं पड़ता . एक मेहमान को आश्रम दिखाने का काम सौंपकर मुझ पर जो विश्वास रखा गया , उसीने यह पाठ मुझे सिखाया . लेकिन मैं यह दावा नहीं कर सकता कि किसी प्रकार की लांच-रिश्वत से मैं अछूता था .
सत्याग्रह – आश्रम में सी. आई. डी. के लोग सरकार की ओर से बराबर आते रहते थे . उसमें एक इस्माइलभाई नाम का खूफिया पुलिस था . हट्टा – कट्टा , श्यामवर्ण का ,और सिर पर रोएंदार टोपी . हम बच्चों को वह बहुत प्यारा लगता था . हम पर वह रिश्वत का सफल प्रयोग करता था . यह निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि वह केवल रिश्वत देता था या साथ – साथ लाड़-प्यार भी करता था . इस्माईलभाई हमेशा हमारे लिए पिपरमिण्ट की गोलियां ले आते . इसके बदले में हमेशा वह एक जानकारी लेना चाहता था – ‘आजकल गांधीजी क्या करते हैं , मुझे नहीं बताओगे ?’
पिपरमिण्ट की गोली से मुंह मीठा करके थोड़ी-सी जानकारी दे देने में हमें संकोच नहीं होता था . ‘ आजकल बापूजी कडुवे नीम की पत्ती की चटनी बनाने का प्रयोग कर रहे हैं ‘ , हमने एक बार कहा . और वह भला आदमी अपनी नोटबुक में बड़ी सावधानी से यह बात नोट कर लेता था . सत्य के प्रयोग करनेवाले बापू को इधर कोई सामाजिक जटिल समस्या हल करने जितना रस कडुवे नीम की पत्ती की चटनी बनाने में लगता था , तो उधर ब्रिटिश सरकार के इस बेचारे प्रतिनिधि को किसी गुप्त सभा की रिपोर्ट की नोंद लेने जितना मह्त्व इस गुप्त रसायन के अनुपान की नोंद करने में लगता था . गांधीजी का कौन-सा प्रयोग किस दिन सरकार को खतरे में डालनेवाला साबित होगा , क्या भरोसा ! चुटकीभर नमक बनाने से दिल्ली की सरकार का सिंहासन डगमगा जायगा , यह कौन जानता था ?
ये सारे प्रसंग दाण्डीकूच के पहले के हैं . उस समय मेरी उम्र मुश्किल से छह वर्ष थी . लेकिन उस समय आश्रम के वातावरण में ही ऐसी राजनीतिक जागृति थी कि अन्य बच्चों की अपेक्षा आश्रम के बच्चे जेल , पुलिस , खुफिया पुलिस , न्यायालय इत्यादि के अर्थ बहुत जल्दी समझ लेते थे . आश्रम मे सी. आई . डी . के लोग बराबर आते – जाते थे . इसलिए आश्रम के बड़े लड़कों  में से कुछ ने हम बच्चों को सचेत कर दिया था कि खबरदार ! कभी कई खबर उन लोगों को न देना . कुछ लोग हमारे सामने ऐसी भी कुछ बातें करते थे कि जिससे हम बच्चों के मन पर यह छाप पड़ती कि अंग्रेज अपने दुश्मन हैं . आश्रम में जो गीत कान में पड़ते , उनमें ये थे :
” मारो नहीं , मरना सीखो रे ,
यही गांधीजी का मंत्र .
मन्दिर ही मानो तुम जेल को ,
तुम होगे स्वतंत्र रे .. “

इन कड़ियों के साथ ही
” तकली नहीं यह तीर है ,
सरकार की छाती चीर दे .
बोलो बिरादर जोर से ,
इन्क़लाब जिन्दाबाद .. “
या –
” सा’ब, टोपावाले !
सा’ब टोपावाले !
मेरे मुल्क में कैसे आये ? “
इस तरह के गीत भी चलते . लेकिन कुल मिलाकर देखा जाय तो मेरे मन में किसी अव्यक्त सरकार नाम की शक्ति के विषय में शायद कुछ गुस्सा था , लेकिन उस सरकार के काले – गोरे या छोटे – बड़े किसी भी प्रतिनिधी के विषय में क्रोध नहीं था . बल्कि इस्माइलभाई जैसे और भी जो लोग हमारे परिचय में आये थे , उनके साथ हमारी सांठ-गांठ हो जाती थी . इसमें हमारे बाल-स्वभाव का हिस्सा जितना था ,उतना या उससे अधिक हिस्सा था बापू की लड़ने की पद्धति का .
इस लडाई के एक उज्जवल प्रसंग की धुंधली छाप मेरे मन पर पड़ी थी , उसका भी जिक्र यहां कर दूं .
लाहौर के कांग्रेस- अधिवेशन के बाद बापू ने वाइसराय को ११ मुद्दों वाला प्रसिद्ध पत्र लिखा . तब से सारे देश मे लड़ाई के नगाड़े बजने लगे थे . आश्रम में राजनीतिक लोगों का आना-जाना बढ गया था . जब से बापू ने जाहिर कर दिया कि वे १२ मार्च १९३० को दाण्डी की ओर कूच करेंगे और वहां पहुंच कर नमक बना कर कानून भंग करेंगे , तब से उनके इस कदम पर तरह तरह की अटकलबाजियां लगायीं जाने लगीं . श्री मोतीलाल नेहरू ने भी इस कदम की बुद्धिमानी के विषय में शंका व्यक्त की . आश्रम में यह अफवाह थी कि उस दिन के पहले ही शायद बापू को सरकार पकड़ लेगी .
दूसरे दिन से प्रार्थना नदी के रेतीले तट पर होने लगी . ११ मार्च को रात – भर लोगों की भीड़ जमा होती रही . सुबह इमली के पेड़ के नीचे देखते हैं कि मोटरों का तांता लगा है . शायद ही कोई अहमदाबाद की मोटर होगी , जो वहां न आई हो . बापू के साथ कूच में कौन कौन रहेंगे , इस विषय में आश्रम में बड़ी सरगरमी थी . चुने गये ७९ लोग फूले नही समाते थे , बाकि के लोग ‘ हमारी भी बारी आएगी’ यह आशा लगाये बैठे थे . हम बच्चों को इस तरह का कोई मौका तो था नहीं . सुबह पण्डितजी को प्रार्थना-भूमि तक जाने ही नहीं दिया , रास्ते में ही उनको घेर लिया गया . पण्डितजी ने धुन गाना शुरु किया: “रघुपति राघव राजाराम.” जहां तक मैं समझता हूं शायद इसी समय से यह धुन गांधी-धुन के नाम से प्रसिद्ध हो गयी . प्रार्थना में पण्डितजी ने भजन सुनाया : ” जानकीनाथ सहाय करें तब कौन  बिगाड़ करे नर तेरो . ” क्योंकि ‘ वैष्णवजन’ वाला पद कूच के समय गाया जाता था . गांधीजी इस तरह कूच का प्रारम्भ करेंगे . यह देखने के लिए लाखों की भीड़ तरस रही थी . लेकिन प्रार्थना की बाद बापू बीमारों को देखने गये .चेचक के कारण तीन बालकों की उस समय मृत्यु हो गयी थी . उनमें पण्डितजी का लडका बसन्त भी था .फिर भी पण्डितजी कूच में आगे – आगे थे .प्रेमाबहन दाण्डी कूच का दृश्य देख कर बावरी हो गयीं . बापू जिस शाल को ओढ़े हुए थे उस पर प्रेमाबहन ने एक बिल्ला लटका दिया और वह उनसे लिपट गयीं . शायद मणिबहन पारिख ने तिलक किया , सूत की गुन्डी पहनायी गयी और वैश्णवजन के साथ राम-धुन गाते हुए बापू निकल पडे . उनके साथ ठेठ असलाली तक सारा अहमदाबाद शहर उमड़ पड़ा .
पीछे आश्रम में हम बच्चे रह गये . बापू के जाने के बाद सुबह छ: बजे हम लोग झण्डा आदि ले कर जेल की तरफ ( दाण्डी कूच की उलटी दिशा में) निकल पड़े और हम ने कूच का आनन्द मनाया .

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