लेखक के दो शब्द

नारायण देसाई( गुजराती संस्करण से )

     बचपन में नानी से रामायण – महाभारत की कहानियाँ सुनता था
 तब कई बार किष्किन्धा के बन्दरों और गोकुल के ग्वालों के प्रति मन में ईर्ष्या होती थी । उस समय मुझे कल्पना नहीं थी कि इस युग में वही भाग्य मेरा भी था ।तुलसीदास की तरह पदसरोज को लक्ष्य कर अनपायिनी भक्ति मैं कभी नहीं कर पाया , लेकिन जाने किस जन्म के पुण्य के कारण इस जन्म में ‘सदा सत्संग’ मिला है : इस पुस्तक में जिनका जिक्र किया गया है सिर्फ उनका ही नहीं, बल्कि दूसरे अनेक सन्तों क सत्संग मिला है ।सन १९६५ में ‘जन्मभूमि’ समाचार-पत्र की ओर से गांधीजी के संस्मरण लिख देने की माँग हुई, तब इन सन्तों में से कुछ सन्तों की स्मरण-गंगा में पुण्यस्नान करने की भावना से मैंने उनकी माँग सहर्ष स्वीकार की । ‘जन्मभूमि’ की आकांक्षा तो यह थी कि सन १९२० से १९४७ के बीच का आजादी की लड़ाई का इतिहास , उस लड़ाई में जिन्होंने नेतृत्व किया ऐसे गांधीजी ,जवाहरलालजी या सरदार जैसे लोगों के साथ जो रहे , उनकी कलम से स्वातंत्र्य-संग्राम की गाथा प्राप्त की जाय । लेकिन इस लेखमाला को मैंने ‘ क्षणमिह सज्जन संगतिरेका’ शीर्षक दिया था ,उसमें सन्तों की पावन स्मृति में अवगाहन करने की मेरी आकांक्षा व्यक्त होती थी । हर सप्ताह ‘जन्मभूमि’ में मिकलनेवाले इन लेखों में उपर्युक्त दोनों आकांक्षाओं का मेल कहाँ तक सधा है , भगवान जाने । लेकिन इन लेखों को पढ़कर अनेक लोगों ने इसको पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की माँग की थी । वह आज ‘बापू की गोद में’ द्वारा पूरी हो रही है । इन लेखों को पुस्तकाकार छपाने के लिए ‘जन्मभूमि’ ने अपनी स्वीकृति दी , अपने चित्रों को पुद्तक में छपाने की अनुमति श्री दत्ता महा ने दी,और कनु गांधी ने अपने लिये हुए छायाचित्रों को पुस्तक में छपाने की स्वीकृति दी , इसके लिए मैं इन सबका आभारी हूँ ।

                                                                                               – नारायण देसाई

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