दूसरा विश्व-युद्ध और व्यक्तिगत सत्याग्रह

दूसरे विश्व-युद्ध ने दुनिया के इतिहास को एक नया मोड़ दे दिया । सम्राज्यवाद के पाँव-तले कुचले हुए , दुनिया के कई स्वातंत्र्योत्सुक देशों में इसके प्रत्याघात हुए । भारत ने इस युद्ध के सम्बन्ध में जो नीति अपनायी , उसका असर दुनिया के अनेक गुलाम देशों पर भी हुआ ।

    प्रारम्भ में तो वाइसराय ने धड़ल्ले से घोषित कर दिया कि इस युद्ध में भारत मित्र-राष्ट्रों के पक्ष में है । देश के ग्यारह प्रान्तों में से आठ प्रान्तों में उस समय कंग्रेस के मंत्रीमन्डल थे । फिर भी उनकी सलाह तक इस विषय पर लेना जरूरी नहीं समझा गया । कांग्रेसी मंत्रियों ने इसके विरोध में अपने त्यागपत्र दे दिये । एक अनुशासन्युक्त पक्ष के तौर पर कांग्रेस की प्रतिष्ठा इस घटना के कारण बढ़ी ।युद्ध की तैयारियों का असर देश पर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा था ।युद्ध के विरोध में किसी भी प्रकार मत-प्रदर्शन करना एक गुनाह माना गया । वाणी-स्वातंत्र्य के तत्व को लेकर बापू ने इस युद्ध के खिलाफ आवाज उठाने का निश्चय किया । कौनसी यह आवाज थी ? युद्ध की तोपों के सामने उससे सवाइ तोपों का वह गर्जन नहीं था, बल्कि आजादी के नाम पर लड़नेवाली सरकार ने वाणी-स्वातंत्र्य के लोकतांत्रिक मूल अधिकार पर जो हमला किया था , उसके खिलाफ यह नैतिक आवाज थी । सत्याग्रह का स्वरूप सौम्य था। सारी दुनिया को स्पर्श करनेवाले एक नैतिक मुद्दे पर बापू ने व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाने का निर्णय किया ।

    प्रथम सत्याग्रही के तौर पर बापू ने विनोबा को चुना । तब देश-विदेशों से पृच्छा होने लगी कि यह विनोबा कौन है ? उनके बारे में एक परिचयात्मक लेख बापू ने लिखा , जो अपने ढंग का अनोखा था । उन्होंने विनोबा की प्रशंसा करते हुए लिखा था , ‘ तकली की सारी सुप्त शक्तियों को विनोबा ने खोज निकाला है । ‘ इस तरह के परिचय से दुनिया क्या समझेगी, या उसका क्या सन्तोष होगा ? काका ने एक दूसरा लेख लिखकर विनोबा का अधिक परिचय कराया। विनोबा के सम्बन्ध में लिखे सर्वोत्तम लेखों में से वह लेख माना जाएगा । उस लेख के अन्त में काका ने लिखा था , ‘ आज इस सत्याग्रह के कारण विनोबा के नाम का परिचय लोगों को हुआ। लेकिन उनकी महत्ता दुनिया को बाद में ध्यान में आयेगी। उस समय विनोबा के नाम से सत्याग्रह को गौरव प्राप्त होगा । ‘

    सेलू नाम के एक गाँव में अखबार के संवाददाता के तौर पर काका को बापू ने इस सत्याग्रह की पहली सभा में भेजा । विनोबा की भाषण की शैली पर काका पहले से ही लट्टू थे । भाषण पूरा होते ही काका की रिपोर्ट तैयार हो जाती थी । इसके बाद दूसरी सभा सेवाग्राम में हुई ।बापू के आशीर्वाद लेकर विनोबा सभा-स्थल पर गये । बापू जाहिर सभा में उपस्थित नहीं थे । हम सब आश्रमवासी गये थे ।विनोबा इन दिनों जो बोलते हैं , उसमें सहजता होती है । लेकिन उस समय उनके भाषणों में वक्तृत्व-कला अधिक रहती थी । उनकी वाक्धारा अस्खलित बहती थी । देहात के लोग समझ सकें , ऐसे उदाहरण और कथाएँ उस समय विनोबा के भाषणों में अधिक रहती थीं ।

    विनोबा और उनके बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह में पकड़े गये अन्य सत्याग्रहियों से जेल में मिलने के लिए काका गये। सेवाग्राम में दूसरे नंबर के व्यक्तिगत सत्याग्रही के चुनाव के सम्बन्ध में काका को खास सन्तोष नहीं था । इस चुनाव के पीछे शायद बापू का यह खयाल होगा कि एक अत्यन्त सामान्य व्यक्ति भी सत्याग्रह में शरीक हो सकता है ।

    इसके बाद इस व्यक्तिगत सत्याग्रह ने भी बहुत व्यापक रूप धारण कर लिया ।जगह-जगह लोग युद्ध-विरोधी प्रचार पर लगाये गये सरकारी प्रतिबन्धों को तोड़ कर जेल जाने लगे । सत्याग्रहियों की नामावली में से अंतिम चुनाव करने का काम बापू के लिए काका कर देते थे। हर रोज ढेर सारे नाम उनके सामने आते थे। उनमें से जो नाम परिचित थे,उनके सम्बन्ध में अपने पूर्व के अनुभव के आधार पर और अपरिचित नामों के सम्बन्ध में उनको जो जानकारी नाम के साथ आती थी,उसके आधार पर काका को नाम पसन्द या नापसन्द करने पड़ते थे। इसीलिए बापू ने काका को आखिर तक व्यक्तिगत सत्याग्रह में शरीक नहीं होने दिया ।

    इस व्यक्तिगत सत्याग्रह – आन्दोलन में भारत के सामान्य व्यक्तियों की असामान्यता और असामान्य माने गये व्यक्तियों की सामान्यता एक साथ प्रकट हो गयी । देश के कोने-कोने से बिलकुल अपरिचित लोग देश के लिए अपना घर-बार , खेती-बारी , जायदाद आदि छोड़कर जेल जाने को तैयार हो जाते थे और एक आदर्श सत्याग्रही के तौर पर जेल-जीवन बिताते थे । दूसरी तरफ शरम की खातिर या अपना नाम सत्याग्रहियों की सूची में शामिल कराने की खातिर ‘सत्याग्रही’ बने हुए प्रतिष्ठित और गण्यमान्य समझे जानेवाले नेता जेल में जाने के बाद एक सत्याग्रही के नाते तो छोड़ दीजिये , लेकिन सामान्य कैदियों के जितनी सभ्यता , मर्यादा या संस्कारिता का भी परिचय नहीं देते थे । यह देखकर बापू और काका के हृदय विदीर्ण हो जाते थे ।

    आजादी की लड़ाई शुरु होने से पहले देश तमोगुण में सोया पड़ा था। शुरु के पचीस वर्षों में जो नेता भारत में कार्य कर रहे थे , वे जनता को उस महानिद्रा से जगाने के लिए रजोगुण का उपयोग करते थे । बापू ने रजोगुण पर सत्त्वगुण का रंग चढ़ाया ।फिर भी आन्दोलन से रजोगुण की छाप पूरी मिट नही गयी थी । अंग्रेजों को हटाकर देश को आजाद बनाना सारे देश का एक सर्वसामान्य ध्येय था ।उस ध्येय में रजोगुण की मात्रा काफी थी । लेकिन सत्याग्रह की नई पद्धति ने ‘ अपनी लड़ाई अंग्रेजों से नहीं , बल्कि अंग्रेजी शासन से है ‘ यह बात लोगों के सामने रखी ।और रजोगुण पर सत्त्वगुण का आवरण चढ़ाया । लेकिन इसको देश के विविध लोगों ने अपनी – अपनी हैसियत के अनुसार अपनाया। एक-दूसरे का हाथ देखकर हस्तरेखा का अध्ययन करना या छूटने की तिथियों का अन्दाज या बाजी लगाना, यह जेल में कुछ सत्याग्रहियों का ‘मूल उद्योग’ था , तो कुछ सत्याग्रहियों ने जेल को अध्ययन करने का अच्छा अवसर मानकर ज्ञानसागर में डुबकी लगायी । दूसरे कुछ लोगों ने जेल-यात्रा का काल चिन्तन-मनन के लिए उपयोग में लिया और गहरा चिन्तन किया । इस तरह के अध्ययन और चिन्तन में से ही  सन १९२० से १९४७ के बीच भारत में उत्तम साहित्य लिखा गया । इस वांग्मय की तुलना कंस के कारागृह में जन्मे श्रीकृष्ण के साथ की जा सकती है ।

    सन १९४० का व्यक्तिगत सत्याग्रह का अन्दोलन और सन १९४२ का ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन दोनों एक प्रकार से समुद्र-मन्थन जैसे आन्दोलन थे । इन आन्दोलनों के कारण भारत के मानव-महासागर का मन्थन हुआ । इस मन्थन में से अमृत भी निकला और गरल भी । स्वराज्य के बाद के इन बीस वर्षों में हम दोनों प्रकार के फलों का स्वाद ले रहे हैं।  

    इसी अरसे का एक प्रसंग है। बापू उस समय पश्चिमोत्तर सीमाप्रान्त के एबटाबाद गाँव में थे । काका ने एक दिन मुझसे कहा , ‘ आज तुझे एक ऐतिहासिक पत्र टाइप करना है ।’ बापू के अनेक पत्रों का ऐतिहासिक महत्त्व था,यह तो मैं जानता था। फिर भी काका खुद  आकर इस तरह की प्रस्तावना करने लगे तो उस पत्र को देखने की उत्सुकता बढ़ी। बापू ने वह पत्र हिटलर के नाम लिखा था । हिटलर यनी उस समय की हिंसा-शक्त का,हिंसा की चरम सीमा का एक प्रतीक और बापू थे अहिंसा के अनन्य पुजारी। दुनिया को विश्व-युद्ध की कराल दाढ़ में न झोंकने की पत्र में आर्द्र हृदय से अपील की थी ।युद्ध की ज्वाला में वह पत्र हिटलर तक पहुँचा या नहीं,भगवान जाने ! लेकिन दैत्यतुल्य माने गये मनुष्य के चित्त में भी मानवता का अंश रहता ही है और उस अंश का स्पर्श करके उस मनुष्य को बदला जा सकता है। पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य असाध्य नहीं है; यह एक सत्याग्रही के नाते बापू की दृढ़ श्रद्धा थी । उसी श्रद्धा को व्यक्त करने वाला यह पत्र था । इस पत्र के सम्बन्ध में जब अखबारों में टीका-टिप्पणी हुई, तब भारत के कुछ सयाने लोगों ने इसे एक पागलपन समझा था ।इन पचीस वर्षों में दुनिया की परिस्थिति का सन्दर्भ इतना बदल गया है कि जहाँ उन दिनों एक आजीवन अहिंसा के पुजारी की कलम से निकली शांति की अपील भी भारत के विद्वानों को पागलपन लगी थी , वहाँ आज पचीस वर्षों के बाद किसी साधारण व्यक्ति की शांति की अपील भी लोगों को रद्दी की टोकरी में फेंकने की चीज नहीं लगती है । बापू की विशेषता यही थी कि वे कम-से-कम पचीस साल के आगे का भविष्य देख सके थे ।

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