परपीड़ा

गरमी के दिनों में शिमला जाने का मौका मिले , तो किसे अच्छा नहीं लगेगा ? खुशनुमा हवा , पहाड़ों की चोटियाँ , एक के बाद एक नयी – नयी उपत्यकाओं की ओर ले जाने का निमंत्रण देती थीं । वहाँ के सफ़ेद बादलों और सफेद पंछियों की कतारों के साथ मन भी उड़ने लगता है ।

    गरमी के दिनों में  भारत की राजधानी दिल्ली से शिमला चली आती है । बारिश के और जाड़े के दिनों में सूना पड़ा हुआ यह शहर गरमी के दिनों में विविध प्रकार की विदेशी चमक – दमक से गूँजने लगता है । बड़े लाट की कोठी ( वाइस-रीगल लॊज ) के सामने वाइसराय के बॊडीगार्ड के सिपाही अपने बूटों को खटक से पटकते हुए रोज कवायद करना शुरु करते हैं। नीचे पोलोग्राउण्ड पर गोरे सवारों के साथ लाल घोड़े कूदने लगते हैं , सड़कों पर मेम साहिबाएँ अपने दर्जनों कुत्तों को साथ लेकर चक्कर लगाने लगाती हैं । उनके एक – एक कुत्ते पर भारत के सामान्य नागरिकों की आय से भी अधिक खर्च होता था । ऊपर ‘ जैको ‘ की चोटी पर उनकी सहेलियाँ चने फेंक – फेंककर बन्दरों को नचाती हैं । यहाँ का वातावरण देखकर किसी को स्वप्न में भी यह ख्याल नहीं आता होगा कि एक अत्यन्त दरिद्र देश की यह राजधानी है ।

    सन् १९३९ में गरमी के दिनों की इस राजधानी में दरिद्रनारायण के प्रतिनिधि बापू पहुँचे थे । वही छोटी-सी चादर , वही छोटा-सा कच्छा और वही सादा तेजस्वी मुख । बापू के जाने से शिमला की सूरत भी बदल गयी थी । उसका साहबी ठाठ न जाने कहाँ गायब हो गया । यहाँ भी वही दर्शनोत्सुक लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी ।

    दूसरे महायुद्ध में हिटलर के विरुद्ध लड़ाई छिड़ गयी । उसमें वाइसराय ने यह बात जाहिर की कि भारत इंग्लैंड के पक्ष में है । इससे स्वाभाविक ही भारत के स्वाभीमान को ठेस पहुँची । इस निर्णय के विरोध में ‘ हरिजन ‘ में लेख लिखकर बापू ने भारत के दिल की बात प्रकट की ।उन दिनों प्रान्तों में लोकप्रिय मन्त्रिमण्डलों का शासन था । भारत किस पक्ष में है , इसकी घोषणा करने के पहले कम – से – कम इन मन्त्रिमण्डलों की तो सरकार सलाह लेती । लेकिन आज एकछ्त्र शासन चलानेवाली ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि को इसकी क्या जरूरत थी ? इधर कांग्रेस में भी विश्व – युद्ध के प्रश्न को लेकर अलग – अलग रायें प्रकट हो रही थीं , लेकिन सब इस बात पर सहमत थे कि ब्रिटिश सरकार के साथ बापू ही बातचीत करें । इसी सिलसिले में बापू शिमला पहुँचे थे ।

     बातचीत पाँच – सात दिन के लिए स्थगित की गयी थी । वायसराय तो अंग्रेज – सरकार के केवल प्रतिनिधिमात्र थे । वे हर प्रश्न पर अन्तिम निर्णय नहीं ले सकते थे । कई मह्त्व के प्रश्नों पर विलायत से आदेश प्राप्त करने तक उनको रुकना पड़ता था । इंग्लैंड से आदेश प्राप्त होने तक बातचीत स्थगित रखी जाती थी ।एक सप्ताह के बाद फिर से बातचीत शुरु होनेवाली थी ।

    इस सप्ताह का उपयोग शिमला के आसपास के पहाड़ों की सैर करने में किया जाय , ऐसे मनसूबे हम बाँधने लगे थे । इतने में बापू का आदेश हुआ ‘ अपना अपना बोरा – बिस्तर बाँधो । ‘

    ‘ कहाँ जाना है ? ‘

    ‘ और कहाँ ? सेवाग्राम वापस । ‘

    ‘ लेकिन एक सप्ताह बाद फिर से बातचीत आगे चलनेवाली है ? ‘

    ‘ हाँ , हाँ , लेकिन सेवाग्राम में दो दिन मिलेंगे न ? ‘

    ‘ वहाँ कौन – सा इतना मह्त्व का काम है ? ‘

    ‘ परचुरे शास्त्री की सेवा का काम तो महत्त्व का है न ? ‘ बापू ने प्रतिप्रश्न किया । काका निरुत्तर हो गये ।

    इस दलील के महत्त्व को जानने के लिए हमें कुछ वर्ष पीछे जाना होगा । एक दिन शाम को बापू से किसीने आकर कहा कि ‘ गौशाला के पीछे एक फकीर जैसा आदमी छिपा खड़ा है। आपको पहचानता है , ऐसा लगता है। ‘

    बापू गौशाला पहुँचे । फकीर जैसे दीखनेवाले व्यक्ति ने बापू को साष्टांग प्रणिपात किया । उसके मुँह से संस्कृत श्लोकों की वन्दना प्रस्फुटित हो रही थी ।

    ‘ अरे , ये तो परचुरे शास्त्री ! कहो , कैसे अचानक आना हुआ ? ‘

    परचुरे शास्त्री संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे । कुछ दिन साबरमती आश्रम में रह चुके थे । फिर शायद लड़कों की गृहस्थी की व्यवस्था बैठाने चले गये थे। वहीं से खबर लगी कि उनको कुष्ठ रोग की छूत लग गयी है ।

    मानव – समाज ने अपने अज्ञान के कारण समाज के कई वर्गों पर हजारों साल से अन्याय किया है , उनमें कुष्ठरोगियों का वर्ग शामिल है । हजारों वर्षों से इस रोग का जिक्र होता आया है और दुनिया के हरएक देश में कुष्ठरोगियों को घृणा की नज़र से देखा गया है। अपने देश में भी कुष्ठरोगियों की हालत अन्य देशों की तुलना में अच्छी नहीं कही जाएगी । सुना है कि सौराष्ट्र के कुछ हिस्सों में कुष्टरोगियों को जिंदा समुद्र में फेंक दिया जाता है ।

    परचुरे शास्त्री ने कहा , ‘ रोग बढ़ गया है । समाज मुझे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मर जाने का निश्चय कर चुका हूँ ।आखिर के दिन आपके आश्रम में आपकी छत्रछाया में बिताकर शांति से मरना चाहता हूँ । मुझे दो रोटियों से अधिक की आवश्यकता नहीं है । यहाँ रहने की अनुमति प्रदान करके अनुग्रह कीजिएगा । ‘

    पर – पीड़ा देखकर वैष्णव – जन का हृदय द्रवित हुआ । बापू ने तुरंत कहा , ‘ मेरे आश्रम में रहने की तो आपको छूट है , लेकिन आपको मरने नहीं दिया जाएगा । ‘

    यह निर्णय करने से पहले बापू को भी थोड़ा सोचना पड़ा था । क्योंकि दूसरे कार्यकर्ताओं की भावना और संसर्ग की सम्भावना का खयाल भी उनको रखना था । देखते – देखते बापू की कुटी के पड़ोस में , लेकिन अन्य कुटियों से कु्छ हटकर , शास्त्रीजी के लिए एक कुटी तैयार हो गयी । एक चारपाई पर शास्त्रीजी का बिस्तर लगा दिया गया और उनके खाने – पीने की व्यवस्था वहीं झोंपड़ी में की गयी ।

    कुष्ठरोग के लिए समाज में जो तीव्र घृणा की भावना है , उसका मुख्य कारण यह है कि इस रोग को भयानक संसर्ग – जन्य रोग के रूप में माना गया है । लेकिन आधुनिक विज्ञान का निर्णय है कि कुष्ठरोग यक्ष्मा या माता के रोग के जितना भी संसर्गजन्य नहीं है । बापू की देखभाल में शास्त्रीजी की चिकित्सा का सारा इंतजाम ठीक हो गया ।

    शिमला से दो दिन के लिए बापू ने सेवाग्राम जाने का निर्णय लिया था । क्योंकि उनके मन में देश की आजादी के प्रश्न पर वाइसराय से बातचीत चलाने और एक कुष्ठरोगी की सेवा करने का महत्व समान था । बापू की जीवन – साधना में व्यक्तिगत चित्त-शुद्धि और सामाजिक क्रांति दोनों अविभाज्य और अभिन्न थे । इसीलिए वे एक रोगी की सेवा भी राष्ट्रसेवा जितनी भक्ति से करते थे । नतीजा यह होता था कि वे किसी व्यक्तिगत काम को उठाते थे तो उस काम को सामाजिक महत्त्व प्राप्त हो जाता था और यही उनके व्यक्तित्व के क्षितिजव्यापी होने का राज है ।

    उसमें फिर कुष्ठरोगियों की सेवा – यह  एक सांकेतिक काम भी था ; यानी समाज के एक अत्यन्त उपेक्षित वर्ग की सेवा का काम । सर्वोदय का प्रारम्भ अन्त्योदय से ही होता है ।

    भारत में अब तक जितना भी कुष्ठसेवा का काम हुआ है , वह करीब – करीब ईसाई मिशनरियों के जरिये हुआ है । ईसाई मिशनरियों ने उसे एक धर्मकृत्य माना है । इसीलिए कुछ ईसाई मिशनरियों ने कुष्ठरोगियों की सेवा करते हुए खुद कुष्ठरोग के शिकार होने का खतरा उठाकर प्राण भी गँवाये हैं । ईसाइयों को छोड़कर अन्य लोग कुष्ठसेवा के काम में नहीं पड़े थे । बापू ने अन्य कई विषयों की तरह इस  विषय में भी पहल की। उनकी और विनोबा की प्रेरणा से श्री मनोहर दिवाण ने कुष्ठरोगियों की सेवा में जीवन समर्पण करने का निश्चय किया । उनकी कुष्ठसेवा के परिणामस्वरूप वर्धा और पवनार के बीच दत्तपुर कुष्ठधाम की स्थापना हुई ।

    कुष्ठरोगी का स्पर्श भयंकर माना जाता है , लेकिन बापू ने परचुरे शास्त्री की सेवा का जो काम अपने जिम्मे लिया था , वह उनके शरीर में मालिश करने का था । परचुरे शास्त्री सेवाग्राम आश्रम आये,तभी उनका रोग असाध्य हो चुका था । फिर भी सेवाग्राम में उनकी जो सेवा और देखभाल की गयी , उससे कुछ समय के लिए उनका स्वास्थ्य कुछ सुधर गया था।उस समय वे हम लोगों को संस्कृत भी पढ़ाते थे । बापू सेवाग्राम से बाहर अधिक समय रहने लगे , तब शास्त्रीजी का स्वास्थ्य फिर से बिगड़ गया । इसलिए उनको दत्तपुर कुष्ठधाम में पहुँचा दिया गया । वहीं उनकी मृत्यु हुई ।

    इस प्रकार बापू के पास हमेशा कोई न कोई मरीज रहता ही था । बीच में तीन – चार महीने के लिए आचार्य नरेन्द्रदेव इलाज के लिए आये थे । विनोबाजी के भाई बालकोबा भी क्षय रोग से पीड़ित थे । लेकिन उससे वे मुक्त हुए और प्राकृतिक चिकित्सा के काम में उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया । किशोरलालभाई तो कायम के बीमार थे । लेकिन इन सबकी सेवा से भी परचुरे शास्त्री की सेवा का पुण्य श्रेष्ठ था । उनकी बापू ने जो सेवा की , वह भगवान् ईसामसीह की योग्यता की कही जाएगी ।

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