हर्ष शोक का बँटवारा

जीवन के प्रारम्भिक काल के ( सात – आठ वर्ष के ) कितने प्रसंग मनुष्य को याद रहते होंगे ? मुश्किल से उंगलियों पर गिनने जितने . लेकिन इन्हीं सात – आठ वर्षों में जीवन के अधिकांश संस्कार उसके मानस – पटल पर अंकित होते हैं . इन वर्षों का असर कृष्णपक्ष की रात्रि के समान होता है . कृष्णपक्ष में किसी एक चन्द्रमा की प्रभा नहीं होती , बल्कि लाखों छोटी- बड़ी तारिकाओं की आभा छायी रहती है . वह रात देखकर हमारी आंखों में चन्द्र की चांदनी नहीं भर जाती , बल्कि इन सब तारिकाओं से आकाश में चित्रित एक रंगोली की आभा छा जाती है .

    मेरे जीवन के प्रारम्भ के सात – आठ सालों ( १९२४ से १९३२ ) की जो छाप मेरे मानस पर बनी है , वह भी इस कृष्णपक्ष के नभोमण्डल जैसी ही है . हां , इतना जरूर है उसमें कहीं – कहीं बापू जैसे चन्द्र – सूर्य की तेजस्विता है , तो कहीं – कहीं मेरे पिताजी या नरहरीभाई जैसे गुरु – शुक्र की अलग चमक भी है , लेकिन इन सबसे बढ़कर कहीं अधिक गहरी छाप उन अग्यात तारिकाओं और नीहारिकाओं से भरी आकाशगंगाओं की है , जो बापू के नभोमण्डल में सदा शोभायमान रहती थी . इसमें कोई एक तारा विशेष पात्र नहीं बना है , बल्कि अनगिनत तारिकाओं का मिला – जुला असर है . ऐसी एक – दूसरी में एकरूप हो जानेवाली उन रात्रियों की इस रंगोली को पृथक – पृथक पंक्तियों में रखने का मैं प्रयत्न करता हूं , तब उनमें से दो रंग विशेष रूप से प्रकट होते हैं . मानव की मन:सृष्टि के दो सनातन रंग : एक आनन्दोल्लास का और दूसरा गहरे विषाद का . बापूजी के आश्रम में जिन अनेक प्रसंगों का अनुभव मुझे हुआ , उनमें इन दोनों प्रकार की छाप है . बहुत दफ़ा तो हर्ष – विषाद की यह छाप एक – दूसरे में मिल गयी-सी लगती हैं . फिर भी सहूलियत की दृष्टि से यहां उनका अलग – अलग वर्णन करूंगा .

    हर्ष की छाप के प्रतीक आश्रम के उत्सव थे और विषाद की छाप के प्रतीक थे उन दिनों के मृत्यु – प्रसंग .

    शैशवावस्था अपने में ही जीवन के प्रत्येक क्षण में हर्ष का कुंकुम घोल देती है . फिर भी यहां तो बीसियों बालक की कुलबुलाहट से गूंजता घोंसला , कलकल करती हुई साबरमती नदी , जीवन का आनन्द लूटने और लुटानेवाले काकासाहब जैसे आचार्य , सत्याग्रह के शुष्क वातावरण में भी ‘ चित्रांगदा और विदाय अभिशाप ‘ को गुजराती में लानेवाले रसिक बुजुर्ग की गोद और पन्डित खरे के स्वर , जो स्वयं मानो भक्ति और संगीत के संयुक्त अवतार थे . फिर पूछना ही क्या !

    आश्रम के उत्सवों को याद करने बैठता हूँ तो सारा बाल्य – काल एक समूचा उत्सव बनकर आंखों के सामने खड़ा हो जाता है . उनमें भी मुख्यतया गोकुल – अष्टमी विशेष रूप से याद आती है , जब आश्रम के सारे लोग एक साथ मिलकर भगवद्गीता का सहपरायण करते थे . हमसे उम्र में पांच – सात साल बड़े लड़के – लड़कियां – रामभाऊ , मथुरी , कनु , इन्दु आदि मिलकर शंकराचार्य का गोविन्दपञ्चकम स्तोत्र एक स्वर में गाकर हमें मुग्ध करते थे . सिर पर लाल रंग की पगड़ी और घुटने तक की छोटी सफेद धोटी पहनकर खुले बदन हम बछड़ों को चराने हो लेते थे और वापस आते समय हमारे मुँह दही – मक्खन के बदले गौशाला के बने पेड़ों से भरे रहते थे .

    और स्मृतिपट पर गोकुल – अष्टमी के बगल ही में खड़ी है रामनवमी – तुलसी रामायण के स्वरों से गूँजती हुई . उसमें प्रमुख पात्र थे तोतारामजी , उत्तर – प्रदेश के अपने खेती – विकास को ठेठ फीजी द्वीप तक पहुँचाकर ये भाई आखिर साबरमती – आश्रम में आकर वहाँ की खेती देख रहे हैं . इनके साथ हमारा सम्बन्ध तभी आता था , जब प्रेमाबहन हमारा एक समय का भोजन बन्द करा देतीं . उस दिन इनकी ( यानी आश्रम की ) खेती में घुसकर हम टमाटर , गाजर , मूली तोड़कर खाते थे और कहीं चोर न कहलाये जाएँ , इसलिए उनके मकान की नाली मे मुँह डालकर ‘ तो……ता ‘ करके जोर से चिल्लाकर उनको सूचना देते दे देते थे . मानो चोरी नहीं की , बल्कि डाका डाला हो . कभी – कभी पकड़े जाते तो वे हमें कमरे में बन्द कर देते थे . कमर में भूल से रह गयी टमातर की डलिया कभी – कभी हाथ लग जाती तो उसको फ़ना कर देते थे . टमाटर खा लेने की खुशी हम समय से पहले ही प्रकट कर देते तो हमें वहाँ से हटाकर दूसरे खाली कमरे में बन्द कर दिया जाता था . और उससे अन्त में क्रन्दन के सहारे मुक्ति मिलती . लेकिन रामनवमी के दिन आश्रम के उस परममंगल विभूति की आध्यात्मिक खेती के फल हम बिना माँगे , बिना समझे , चखते थे , जिसकी मिठास उन गाजर – टमाटरों से बहुत गहरी और स्थायी थी , यह आज ध्यान में आता है . ऐसी ही एक रामनवमी के दिन ही तो सूत्र-यग्य ( हर उत्सव को बापू सूत के कोमल धागों से बाँधते ) करते हुए थोड़े क्षणों में विनोबा की आँखों से भक्तियुक्त आँसू टप- टप -टप टपकने लगे थे न !

लेकिन इस तरह के धार्मिक और सामाजिक त्योहारों को भी पीची छोड़ने वाली याद चरखा – जयन्ती ( रेटियो बारस ) की है . बापू के आश्रम में बापू का ही जन्मदिन ? यह कैसा शिष्टाचार ? लेकिन इस जन्मदिन को बापू ने अपना जन्मदिन माना ही नहीं था . यह तो चरखे का जन्मदिन था . इसलिए स्वयं बापू भी हमारे साथ उसी उत्साह से उसमें शरीक हो जाते थे . लोगों से बचने के लिए उस रोज उनको कहीं भाग जाना नहीं पड़ता था और न उस दिन के नाटक का उनको प्रमुख पात्र बनना पड़ता . उस दिन बापूजी एक सामान्य आश्रमवासी की तरह ही रहते थे . कभी हमारी दौड़ की स्पर्धा में समय नोट करने का काम करते  , तो कभी – कभी हमसे बड़े लड़कों के कबड्डी के खेल में हिस्सा लेते . कभी – कभी हम लोगों के साथ साबरमती नदी में ( बाढ़ न हो तब ) तैरते भी थे . शाम को हमें भोजन परोसते  और रात को अन्य आश्रमवासियों की तरह नाटक देखने के लिए प्रेक्षक के रूप में बैठ जाते . उस दिन का प्रमुख पात्र होता था चरखा . चरखा – द्वादशी का दिन गांधी – जयन्ती काभी दिन है , यह तो दो – चार चरखा – द्वादशियों को मनाने के बाद मालूम हुआ .

    आजकल चरखा – द्वादशी के दिन बापू की झोपड़ी या बापू के मन्दिर खद़्ए किये जाते हैं . उनके फोटो की तरह – तरह से पूजाएँ की जाती हैं और सूट की  की अपेक्षा टूटन का ही अधिक प्रदर्शन दिखाई देता है . लेकिन उन दिनों का जो दृश्य मेरी आँखों के सामने आता है , उसमें बापू का फोटो कहीं भी नहीं देखता हूँ . अखण्ड सूत्रयग्य उस समय भी चलते थे . विविध प्रकार के विक्रम ( रेकार्ड )   तोड़ने में हम बच्चों को अपूर्व आनन्द और उत्साह रहता था . कोई सतत आठ घण्टे कात रहा है तो दो साथी एक के बाद एक  करके २४ घण्टे अखण्ड चरखा चालू रखते हैं . दिनभर काते हुए सूत के तारों की संख्या नोट कराने में एक – दूसरे की स्पर्धा चलती . कातते हुए भी अन्त्याक्षरी चलाते रहते . प्रारम्भ हमेशा ‘ रघुपती राघव राजाराम ‘ की धुन से ही होता . उस समय ‘ इइश्वर अल्ला तेरे नाम ‘ का समावेश धुन में नहीं हुआ था . अन्तिम कड़ी पूरी होते – होते ही अन्त्याक्षर से शुरु होनेवाली कविता दूसरा बोल देता था . ‘ आश्रम भजनावलि ‘ का खजाना तो हमारे पास था ही . जो होशियार लड़के थे , वे गीता के ऐसे सब श्लोक याद कर लेते थे कि जिससे प्रतिपक्षी को उस श्लोक के अन्त में कठिन अक्षर का सामना करना पड़े . श्लोकों में शंकराचार्य अय्र भतृहरि के श्लोकों का विशेष प्रयोग होता था . रामायण के दोहे – चौपाइयों का तो बड़ा भण्डार था ही . इन सबके साथ सत्याग्रह – आन्दोलन के बढ़ते हुए चरण के साथ कदम मिलाने वाले गीत भी बीच – बीच में आ जाते . कुछ गीत इस प्रकार के थे :

                              यह सिर जावे तो जावे ,

                               पर आजादी घर आवे .

                                यह जान फ़ना हो जावे ,

                                 पर आजादी घर आवे ..

    और –

                                   चलाओ लाठी चलाओ डण्डा ,

                                   उड़ायेंगे हम अपना झण्डा .

                                   रक्त हमारा नहीं है ठण्डा ,

                        बल्कि अग्नि तरंग – हमारी शुरु हई है जंग..

    या तो

                                   अटूट यह कच्चे सूत का धागा ,

                                   हाँ , उस लोहे की बड़ियों को भी तोड़े-

                                   अटूट यह कच्चे सूत का धागा ..

    इसी तरह जलियाँवाला बाग का स्मरण करानेवाला रतनबहन का गरबा गाया जाता . खुद हिंसा काप्रयोग भले न किया हो , लेकिन आश्रम के गीतों में भगतसिंह का गौरव कम नहीं था .

    आज जब फिल्मी गीतों के बिना अन्त्याक्षरी कैसे खेली जाय , इस परेशानी का अनुभव करनेवाले बच्चों को देखता हूं , तो मुझे अपने पर ही ईर्ष्या होती है .

    इन उत्सवों में आश्रम के भाइयों की अपेक्षा बहनें ही अधिक हिस्सा लेती थीं , ऐसा मेरे मन पर असर है . हरेक उत्सव में उनको अपनी रसोई की कला का प्रदर्शन करने का मौका मिलता था ,ऐसा तो नहीं कहा जा सकता . चरखा – द्वादशी के दिन तो एक ही समय भोजन रहता था . ( मेरे पिताजी हमारे घर में तो इस दिन मिष्टान्न ही खाते . कहते थे , ‘ आज के दिन तो भाई हम अच्छी – अच्छी चीज खायेंगे . अपने को यह कठोर जीवन पसन्द नहीं . ‘ ) शाम को सोमनाथ – छात्रालय के आँगन में सब साथ खाने बैठते तो भी फलाहार ही मिलता था . लेकिन उस केले , खजूर और मूँगफली परोसने में भी आश्रम की बहनों को का उत्साह कुछ और ही था . रात के नाटक में लड़कों के जितनी ही संख्या लड़कियों की होती थी . रास-क्रीड़ा में दोनों साथ होते . किन्तु गरबा उनके अलग होते थे . मेरे मन पर सबसे अधिक छाप आश्रम की बड़ी बहनों की भक्ति की थी . उत्सव – स्थानों को सजाने में और अन्य प्रकार से भी वह प्रकट होती थी .  लक्षमीबहन खरे के घर में सुबह से ही पारिजात के फूलों का ढेर जमा हो जाता था . फिर मालाएँ बनाना शुरु हो जाता . आश्रम की सब बहनों में एक बहन की मूर्ति आँखों के सामने विशेष रूप से आती है . वह है काशी बहन गाँधी की . काशी के उच्चारण मात्र से किसी सनातनी हिन्दू के मन में जो पवित्र भावना जाग उठती है , उतनी ही पवित्र भावना काशीमौसी के स्मरण से मेरे मन उठती है . बुढ़ापे में उत्तर – पश्चिमी सीमाप्रान्त के पैर फल जितनी सहज मधुरता से गाये हुए उनके स्वर कान मे गूँजते थे .

                           ” ठुमुकि चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ ”

     मुझे विश्वास है कि काशीमौसी यह गीत गाते समय भगवान रामचन्द्र की वह बालमूर्ति अपने मानस – मन्दिर में देखती होगी , जो अपने नन्हें पाँवओं पर चलते समय बीच – बीच में जमीन पर गिर पड़ती हो . क्योंकि रामजी की सेना के सिपाही जैसे हम बच्चे अपने हृदय में माता कौशल्या जैसा प्यार काशीमौसी से पाते थे .

    काशीमौसी की तरह दूसरी याद बड़ी बहन गंगाबहन (वैद्य ) की है .  उनकी यूनानी दवाओं की अपेक्षा उनकी मीठी वाणी ही हमारे मन पर अधिक असर कर जाती थी . बंगाल की बाढ़ – पीडितों की मदद में एक दिन आश्रम में सब लोगों श्रमदान किया . मैं सबसे छोटा था . मुझे कौन काम देगा ? गंगाबहन ने मुझे अपनी शीशियाँ धोने का काम दिया और दो आने दिये . मेरे जीवन की वह प्र्थम कमाई थी .उस समय अन्य लोगों की तरह मुह्जे भी लगा कि मुह्जे जो मजदूरी मिली , वह मेरे काम की तुलना में गंगाबहन के लाड़ के कारण ही अधिक मिली थी .

    मृत्यु का प्रथम दर्शन मुझे मेरे लँगोटिया यार वसन्त खरे की मृत्यु के रूप में हुआ . उसके पिता बचपन में हमारे लेखक थे , तो वसन्त हमारा पठक था . था तो वह मुझसे ग्यारह महीने ही बड़ा , लेकिन उसने पढ़ने में बहुत प्रगति कर ली थी . इसलिए वह रोज पास बैठाकर ‘ ईसप नीति ‘ में से कथाएँ पढ़कर सुनाता था . एक दिन अचानक उसको बुखार चढ़ा . बुखार तो कैयों को चढ़ता है , उस समय भी दूसरे लोगों को बुखार चढ़ा था . लेकिन दूसरे लोगों की माता बुखार में बाहर फूट निकली थी , वसन्त की माता अन्दर ही अन्दर दबी रही , जिसके कारण वह भगवान की गोद में चला गया . हम कुछ समझ ही नहीं पाये . पण्डितजी ने अपनी व्यथा प्रार्थना के भजनों रूप में प्रवाहित की . आई ( स्व. लक्ष्मीबहन खरे ) के लिए वह भी सम्भव नही था . क्योंकि उनकी लड़की मथुरी भी चेचक से बिस्तर में पद़्ई थी . हम गाये भी नहीं और रोए भी नहीं . लेकिन उस समय से मृत्यु हृदय में ऐसा घर कर गयी है कि जब कभी किसी की मृत्यु देखता हूं तो वसन्त ही नज़र के सामने आता है .

 उस वर्ष माता की बीमारी ने आश्रम के तीन बालकों का बलिदान लिया . पण्डितजी का लड़का वसन्त , मथुरादासभाई का लड़का मेघजी और भगवानजीभाई की लड़की गीता .  पू. इमाम साहब का इन्तकाल भी इसी बीच हुआ था . मगनलाल काका और रसिक गाँधी इनसे पहले गये . ऐसे मौकों पर पण्डितजी जैसे सन्त आनन्दघन का “ अब हम अमर भये , न मरेंगे ” यह गाते या फिर ” मंगल मन्दिर खोलो” गाते . प्रार्थना के बाद बापू कुछ बोलते भी थे . लेकिन उस प्रवचन की अपेक्षा बापू का मरनेवालों के स्वजनों को अपने पास बिठा लेना अधिक मह्त्व का होता था . मगनलाल काका गये उस दिन तो अपना मौन भी शायद तोड़ा था . दूसरे भी एक प्रसंग पर उन्होंने अपना साप्ताहिक मौन तोड़ा था  . लेकिन वह प्रसंग कालक्रम के अनुसार बाद में आता है , इसलिए उसका जिक्र बाद में करूँगा .

    मरनेवालों के स्वजनों को अपने पास बैठाकर बापू मानो उनकी सारी वेदना अपनी वेदना बना लेते थे . ऐसे प्रसंगों पर बापू यदि प्रवास पर हों तो हर रोज उनको पत्र लिखते .

    और अकेले बापू ही क्यों ? उनके आश्रम में किसीका भी दुख उसका अकेले का नहीं होता था . इमाम साहब के चल बसने के बाद अमीनाबहन मेरी माँ की विषेष लाड़ली बन गयीं  थी . वसन्त की मृत्यु के बाद पण्डितजी की गोद में बैठने और मथुरी के हाथ से सिर में तेल की मालिश कराने का वसन्त का स्थान मुझे ही प्राप्त हो गया , ऐसा मुझे लगा . अरे ! आश्रम में ‘लंकापति’ कुत्ता मर गया तो उसका शोक भी हममें से क-इयो को एक -सा हुआ था .

  आश्रम के उत्सव और आश्रम के मरण अन्य सब दृष्टियों से उत्तर – दक्षिण ध्रुव जितने अलग – अलग थे , लेकिन एक बात में वे समान थे . हर्ष हो या विषाद , दुख हो या सुख , आश्रम में इनका बँटवारा सबके साथ होता था . 

स्नेह और अनुशासन

पिताजी को मैं ‘ काका ‘ कहता था . आगे के सब प्रसंगों में उनका जिक्र मैं ‘ काका ‘ के नाम से ही करूँगा . मेरे लिए वही नाम स्वाभाविक है . बचपन में बापू क्या , और काका क्या , दोनों हमारे लिए मेहमान जैसे ही थे . साबरमती – आश्रम उनका हेड क्वार्टर था , लेकिन वहाँ वे जम कर रहें तब न ! जेल में नहीं रहते थे तब रेल में रहते थे .

    काका घर आये हैं , माँ कोई खास चीज बनाने की तैयारी में है , और उसी समय मैं काका से पूछता हूँ , ‘आप वापस कब जायेंगे ? ‘

    काका हँसकर जवाब देते थे , ‘ सरकार जब मेहमान बना कर ले जाएगी तब . ‘ मेरे शैशव का पूरा काल , मुझे ऐसा जान पड़ता है , मानो वह हमारे बुजुर्गों की जेल – यात्रा और दो जेल – यात्राओं के बीच का काल हो . भारत की जनता के लिए भी अहिंसक आन्दोलनों का वह शैशव – काल ही था . यही वह काल था ,  जब पहले – पहल भारत के शिष्ट लोगों ने जेल को महल मान लिया . इसलिए आश्रम के बच्चों के लिए सरकार का मेहमान बनने की घटना नई बात नहीं थी . एक बार काका को लेने के लिए पुलिस की काली गाड़ी आयी , तब मैंने काका से कहा , ‘ आप यह थोड़े दिन की सजा भुगत कर क्यों आते हैं ? इस बार लम्बी सजा काट कर आना . ‘ और सचमुच उस बार उनको लम्बी सजा ही हुई . इसके बाद वे दिन याद आते हैं , जब जेल में काका से मिलने जाते थे . छोटी – सी चड्डी और छोटा – कुर्ता . इन दोनों पर नीली धारियाँ . वैसे काका को सब तरह की पोशाकें फबती थीं . लेकिन जेल की पोशाक में वे दुबले लगते थे . माँ के साथ घर की बातें होती थीं . मैं तो उनको उनकी जेल की दुनिया के सम्बन्ध में ही तरह – तरह के प्रश्न पूछता था . जेल की बैरक , जेल का भोजन , जेल का काम और जेल के साथी – इत्यादि की जानकारी मेरे लिए किसी अग्यात प्रदेश की कहानी बन जाती थी . राष्ट्रीय आन्दोलन में कारागृह – वास की घटना का एक अनोखा स्थान था . एक ओर जहाँ उसने प्रजा में से सरकार का भय एकदम समाप्त कर दिया , वहीं दूसरी ओर सच्चे सत्याग्रहियों के लिए कष्ट सहन करने का मौका उसने दिया . तीसरा लाभ यह हुआ कि अनेक सत्याग्रहियों के लिए जेल एक स्वाध्याय – प्रवचन का विद्यापीठ ही बन गया . काका को बेलगाँव जेल में ये तीनों लाभ प्राप्त हुए . हर जेल – यात्रा हमारे पारिवारिक जीवन को स्पर्श करती ही थी . लेकिन उस बार काका को जुर्माना हुआ . उसकी वसूली के सरकारी अफसर हमारे कुल के दीहण गाँव पहुँच गये . वहाँ मेरी दादी-माँ इच्छाबहन ने हिम्मतपूर्वक जुर्माना भरने से इन्कार कर दिया . इस कारण उसको अफसरों के अपमान भरे शब्द सुनने पड़े . इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि सत्याग्रह के आन्दोलन ने ठेठ दूर – देहातों की जनता को भी निर्भय बना दिया था . बेलगाँव जेल में काका को काफी कष्ट उठाने पड़े . बड़ा कष्ट तो एकान्तवास का और अलग पड़ जाने का था . कई बार तो हम लोगों में से कोई भी उनसे मुलाकात के लिए नहीं पहुँच पाता था . पत्र – व्यवहार पर पाबंदी थी . क्योंकि वहाँ के जेलर या सुपरिण्टेण्डेण्ट गुजराती भाषा जानते नहीं थे . और मुझे या माँ को अंग्रेजी नहीं आती थी . कई महीने बाद काका से मिलने गये , तब देखा कि काका का चेहरा काफी बदल गया है . उनके गंजे सिर के रहे – सहे बाल सफेद होने लगे थे . चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ने लगी थीं . कुछ दाँत भी गिर गए थे . कुल मिलाकर बुढ़ापे के स्पष्ट लक्षण दिखाई देने लगे थे . काका को जेल में अन्य राजनीतिक कैदियों से अलग रखा गया था . क्रिमिनल ( अपराधी ) कैदी तो उनसे बात भी नहीं कर सकते थे . ( भाषा का ग्यान न होते हुए भी सिर्फ़ काम के निमित्त काका के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करनेवाले एक कन्नड़ मुस्लिम कैदी की तारीफ़ हमारी कुछ क्षणों की मुलाकात में भी काका ने की थी . ) कारावास के इन्हीं दिनों में काका ने बापूजी की ‘अनासक्ति – योग’ पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया और गीता पर अपना भी भाष्य लिखा . डायरी छोड़कर काका की यही पुस्तक शायद उनके सब ग्रन्थों में सर्वश्रेष्ठ कही जाएगी . कारागृह ने काका को एक ओर बुढ़ापा दिया , तो दूसरी ओर गीता भी दी .

साबरमती – आश्रम के बाहर बापू और काका के साथ रहने का मौका कुछ दिन के लिए मिला था , पूना में . काका कुछ दिनों के लिए मुझे साथ ले गए थे . इन्हीं दिनों बापू के इक्कीस दिन के उपवास हुए थे . और इसी समय मैंने मलेरिया के कारण खाट पकड़ ली . काका के लिए वह कसौटी का समय था . खुद चाहे जितना कष्ट सहने वाले काका मुझे या माँ को जरा कुछ हो जाए , तो घबड़ा जाते थे . बापू का अनशन तो उनके शरीर और मन को निचोड़ ही देता था . बापू के आखिर – आखिर के कुछ उपवासों के समय खाना छोड़ने के कारण बापू का जितना वजन घट जाता था , उतना ही वजन कस्तूरबा और काका का खाते – पीते भी घटता हुआ मैंने देखा है . इस तरह बापू के अनशन और मेरे बुखार ने काका पर दोहरा बोझ डाला .

    मेरा बुखा सख्त था . दो दिन तक नार्मल नहीं हुआ . तीसरे दिन १०५ डिग्री के बदले १०६ डिग्री  तक बढ़ गया . काका अपना दफ़्तर मेरे बिस्तर के पास ले आए . मुख्यतया पत्र – व्यवहार का ही काम रहता था . बापू के स्वास्थ्य की जानकारी दुनिया के कोने – कोने तक पत्रों द्वारा पहुँचाने और बापू से मिलने के लिए या उनका समाचार लेने आये हुए लोगों को प्रेमपूर्वक बाहर से ही विदा करने का मुख्य काम काका को करना पड़ता था . पत्र – व्यवहार तो मेरे बिस्तर के पास बैठकर ही काका करने लगे . बीच – बीच में सिर पर ठण्डे पानी की पट्टी रखते जाते या एकाध बार बापू के पास हो आते थे . माँ से दूर रहने का यह मेरा पहला ही प्रसंग था . इसलिए बुखार में मेरा यही जाप चलता रहता , ‘ माँ को बुलाओ , माँ को बुलाओ . ‘ मेरे स्वास्थ्य की चिन्ता बापू को न करनी पडे़ ‘ इसीकी अधिक चिन्ता काका के मन में थी . पूना में सेवा करने वालों की कमी तो थी नहीं कि उसके लिए माँ को बुलाने की जरूरत हो . तीसरे दिन सन्निपात शुरु हुआ . शरीर को भान नहीं था , लेकिन यन्त्रवत माँ का जाप चालू था . काका ‘हाँ’  भी नहीं कह सकते थे और ‘ना’ भी नहीं कर सकते थे .

    एक बार मेरी बगल में मनु गाँधी ( अब मशरूवाला ) आकर बैठी . मैंने पूछा,’  माँ आई है ?’ यत्नपूर्वक रोके हुए आँसू काका की आँखों से बहने लगे . मनुबहन ने वह देखा . उन्होंने यह बात कस्तूरबा से कही . उन्होंने बापू से कह दिया . बापू नी काका को पास बुलाकर कहा , ‘महादेव,एक तार लिखो .’ जब भी तार देना हो तो बापू इसी तरह काका को बुलाकर लिखवाते थे . इसलिए काका कागज – कलम लेकर हाजिर हो गये . लेकिन माँ को बुलाने के लिए तार लिखा जा रहा है , यह देखते ही काका ने उसका विरोध किया – ‘उसको बुलाने की क्या आवश्यकता है ? यहाँ बाबला की देखभाल के लिए काफी लोग हैं . मनु है , बा हैं और डॊ. दीनशा तो हररोज दो बार देख जाते हैं . उसका बुखार मलेरिया का है . दुर्गा के यहाँ पहुँचने तक तो उतर ही जाएगा . खामखा खर्च…’

    काका का वाक्य बीच ही में काट कर बापू ने कहा , ‘मैंने तुमको तार लिखने के लिए बुलाया है,मुझसे बहस करने के लिए नहीं . ‘

    काका और बापू को काफी बहस करते हुए मैंने देखा है – एक – एक शब्द या एक – एक विराम – चिह्न के लिए बहस चलती . कभी – कभी यह बहस मौखिक न रह कर पत्र – व्यवहार में भी जारी रहती और ऐसा पत्र – व्यवहार कई दिनों तक चलता रहता . लेकिन इस समय बाबला की की बीमारी के सम्बन्ध में बहस का अधिकार महादेव को नही था , वह बापू की आग्या थी और आग्या है , ऐसा मालूम होते ही महादेव उसको शिरोधार्य करते थे . फिर दलील का कोई स्थान नहीं रहता था . तार किया गया और माँ पहुँच गयी और सचमुच माँ के पहुँचने से पहले ही मेरा बुखार उतर गया था . काका का दफ़्तर मेरे बिस्तर के पास से उठकर बापू के पास पहुँच गया था . इअ प्रसंग की जानकारी दो – तीन दिन के बाद काका ने मुझे दी , तब तब उनके चेहरे पर मुस्कान झलक रही थी .

१९३० – ३२ की धूप – छाँह

भट्ठी की करामात देखो मेरे भाई .                     भले – लोग दीवाने बन फिरें भाई ..

    साबरमती – जेल के पीछे साबरमती गाँव की शराब – भट्ठी के सामने खड़ी रहकर आश्रम की बहनें शराब – विरोधी गीत , जो सूरत जिले से लेकर यहाँ तक गाया जा रहा था , गा रही थीं . यह बहनें क्या करती हैं और इनके साथ क्या होता है , यह देखने के लिए अहमदाबाद शहर से प्रेस – रिपोर्टरों के साथ काफी भीड़ इकट्ठा हुई थी . इन बहनों में से एक की उँगली पकड़ कर मैं यह दृश्य देख रहा था और बीच – बीच में एकाध गीत के साथ अपना सुर मिला देता था –

                  शराब ने सब चौपट कर दिया

                   हे शराबी ! तू छोड़ दे न शराब !

    स्वातन्त्र्य – संग्राम का एक नया अध्याय मेरे बाल – नयनों के सामने शुरु हो रहा था .

    कई लोगों के मन में शंकाएँ थीं कि गांधीजी के इस नये कार्यक्रम का क्या नतीजा होगा . मणिबहन परीख पिकेटिंग ( धरना ) करने निकली , तब अहमदाबाद शहर के उनके रिश्तेदारों और स्नेही – सम्बन्धियों के मन में यह डर था कि कहीं शराबी लोग नशे में इनका अपमान न कर बैठें . लेकिन बापू ने आश्रम की बहनों में वीर- श्री का कुछ अद्भुत संचार कर दिया था . दाण्डीकूच के बाद सत्याग्रह – आन्दोलन में शायद यह सबसे बड़ा कदम कहा जाएगा . किसी आन्दोलन में खुले तौर पर स्त्रियों के शामिल होने की घटना भारत के इतिहास में एक नयी परम्परा डालनेवाली थी . शराबबन्दी का कार्यक्रम स्त्रियों के लिए बिलकुल नया – सा था . लेकिन इसने आश्रम की ही नहीं , बल्कि गुजरात की और सारे भारत की स्त्रियों को देश के सामाजिक जीवन में एक गौरवपूर्ण स्थान दे दिया .

    उन दिनों आश्रम में बड़ी चहल – पहल थी . दाण्डीकूच के हर पड़ाव से नये – नये समाचार आते रहते थे . इधर अहमदाबाद में काका की सभाओं में लाखों की संख्या में लोग आते थे . बिना लाउडस्पीकर के उनके भाषण होते . सभाओं में बोलने या सुनने की अपेक्षा देखने की जिग्यासा ही अधिक रहती थी . और देखने की अपेक्षा क्षणभर में चुटकीभर नमक हजारों रुपये दे कर नीलामी में खरीदने और सरकार की नाराजी मोल लेने का महत्त्व अधिक था .

    आश्रम की बहनों की एक टुकड़ी ने आश्रम की वयोवृद्ध महिला गंगाबहन के नेतृत्व में खेड़ा जिले में हँसते हुए लाठियों के प्रहारों को झेला . गंगाबहन की खादी की शुभ्र साड़ी उनके सिर से बहनेवाले खून से केसरिया रंग की बन गयी . लीलाबहन आसर को बोरसद के पुलिस – थाने में अकली बुलाकर दारोगा या तत्सम पुलिस अफसर ने गालियाँ सुनाईं . आम तौर पर किसीका एक शब्द भी बरदाश्त न करनेवाली मेरी ‘ लीला बूआ ‘ ने हँसते हुए उन गालियों को सहा . भारत – कोकिला सरोजिनी नायडू ने धारासणा के नमक के ढेरों के पास कड़ी धूप में दिनभर खड़ी रहकर प्राचीन तपस्विनियों के आधुनिक स्वरूप का दर्शन कराया . इस तरह के अनेक उदाहरणों द्वारा भारत का नारीत्व जाग उठा . सत्याग्रह – आन्दोलन में महिलाओं को शरीक करके बापूजी ने राष्ट्रीय – आन्दोलन को एक नया पैमाना दे दिया .

    हर रोज लड़ाई के मैदान से आनेवाले समाचारों से आश्रम गूँज उठता था . आश्रम मानो एक सैनिक पड़ाव – सा बन गया था . जेल से छूटकर बापूजी थोड़े दिन के लिए आश्रम में आए थे . अपने यग्य में वे एक के बाद एक आहुतियाँ चढ़ाते जा रहे थे .

    एक दिन उन्होंने आश्रम की बहनों की सभा बुलाई . हम बच्चों को उसमें नही आने दिया . लेकिन सभा में क्या हो रहा है  , इसकी खबर हमारे कानों तक पहुँचे बिना नहीं रही . इस सभा में आश्रम की बची बहनों को बापू जी ने जेल जाने का आह्वान किया.

हमारे जैसे बच्चों की माताओं को भी उसमें शामिल कर लिया था . बापू का आह्वान यानि सारे देश का , अपमानित मानव – जाति का आह्वान ! इसका इनकार करने का सवाल ही नहीं था . लेकिन माँ और पिताजी , दोनों के जेल में जाने का प्रसंग मेरे लिए पहला ही था . यह दिक्कत सिर्फ़ मेरी नहीं थी , पिताजी और माँ की भी थी . वे दोनों मेरी खास व्यवस्था कर देने की फ़िकर में थे . आश्रम के बच्चों को अपने हरिजन – कन्या – छात्रालय में रख लेने का सुझाव अनसूयाबहन ने दिया था . लेकिन हम लोगों की पढ़ाई ठीक से चलती रहे , इस ख्याल से नरहरीभाई और पिताजी ने हम तीनों ( आनन्दी , मोहन , बाबला ) की रहने की व्यवस्था स्व . रामनारायण वि. पाठक के घर पर कर दी थी . अधिक सहूलियत की यह जगह होते गुए भी हम अन्य बच्चों से अलग रहने को तैयार नहीं थे . एक रात हम रामनारायण काका के वहाँ ठहरे . लेकिन उस सारी रात मैं रोता रहा . दूसरे दिन हमको सब बच्चों के साथ अनसूयाबहन के यहाँ पहुँचा दिया गया . अनसूयाबहन और शंकरलालभाई के असीम प्यार के बावजूद इस जगह हमें काफी असुविधाओं का सामना करना पड़ा .

    ‘कौओं – कुत्तों की मौत मरूँगा, लेकिन स्वराज्य – प्राप्ति तक आश्रम में फिर से पाँव नही रखूँगा ‘ इस तरह की भीष्म – प्रतिग्या करके बापू फिर से जेल चले गये . सरकार किसानों की जमीन जप्त कर रही हो , तब आश्रम अपनी सम्पत्ति को क्यों सुरक्षित रखे ? य़ह उनकी दलील थी . और बापू ने सरकार को पत्र लिखकर स्वेच्छा से आश्रम सरकार के हवाले कर दिया . आश्रम का पुस्तकालय अहमदाबाद की नगरपालिका को सौंप दिया . आश्रम के पुस्तकालय में दक्षिण अफ़्रीका से साथ लायी बापू की किताबें और काका की किताबें मिलकर करीब दस हजार किताबें थीं . आश्रम के अधिकांश भाई – बहन जेल चले गये . अन्य लोग अपने – अपने प्रदेश में काम करने चले गये . उस समय आश्रम की हालत वैसी ही हो गयी , जैसे कुंजबिहारी के अभाव में बृज की हो गयी थी . आश्रम की गायों ने तो इसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिया . आश्रम के पास पिंजरापोल ( कांजी हाउस ) में उन गायों को लिवाया जा रहा था , तब ‘हम्मा’ ,’हम्मा’ पुकार कर वे आश्रम में वापस भाग आतीं और आश्रम की भूमि को रौंदने तथा नाक से जमीन सूँघने लगतीं . अनसूयाबहन के यहाँ से हम एक बार सूने पडे हुए इस आश्रम को देखने गये थे . वहाँ का दृश्य देखकर ही रोना आता था . कभी हमारे खेल – कूद से और गानों से गूँजता हुआ आश्रम इस समय सूनसान पड़ा था . आश्रम के मकान मानो खाने को दौडते थे . कुछ मकानों के दरवाजे या खिडकियाँ टूट चुकी थीं . प्रेमाबहन की देखभाल में हमेशा साफ-सुथरे रहनेवाले आँगनों में जगह – जगह ऊँची घास उग कर सूख भी गयी थी . हृदयकुंज का हृदय गायब था . हम वहाँ ज्यादा समय ठहर ही नहीं सके . आश्रम के इमली के पेड़ के नीचे थोड़ी देर बैठे रहे . वह पेड़ आश्रम की स्थापना से पहले का था . आश्रम में वह सबसे बड़ा वृक्ष था . इसने अपनी छाया में बापू और उनके साथियों के तम्ब्बुओं को लगते देखा था . धीरे – धीरे तम्बुओं की जगह एक – एक पक्का मकान खड़ा देखा था . कई बार इस वृक्ष के नीचे जेल की काली मोटर खड़ी रहती थी . अनेक बार अहमदाबाद के सेठों की मोटरें भी वहाँ पहुँचती थी . इसी वृक्ष की छाया में से डाण्डीकूच का प्रारम्भ हुआ था . तब आश्रमवासियोंने बापू को गौरवपूर्वक बिदा किया था. कुछ देर हम वहाँ गुमसुम बैठे रहे . हमारे खयाल से हमारे ये नि:श्वास वह वृक्ष भी समझ गया होगा .

नयी तालीम का जन्म

राष्ट्र – जीवन के धड़कनों के साथ यदि आपका व्यक्तिगत जीवन भी धड़कता हो तो एक अपूर्व भाग्य ही माना जाएगा . मुझे यह भाग्य प्राप्त हुआ था . गांधीजी ने दुनिया को एक के बाद एक जो नयी देनें दीं , उनमें नयी तालीम एक अमूल्य रत्न माना जाएगा . नयी तालीम का विकास और मेरी पढ़ाई की व्यवस्था एक ही समय हुई ,  यह एक विचित्र संयोग था .

    प्रसंग निजी था , लेकिन उसका महत्त्व सार्वजनिक था . कई वर्षों में हम सब परिवार की तरह एक साथ नहीं रह पाये थे . काका या तो जेल में या सफ़र में रहते थे . १९३२ में माँ भी जेल चली गयीं . तब हमारी स्थिति ‘ कहाँ चन्दन और कहाँ मलयागिरि ‘ की तरह हुई . बापू वर्धा से सेगाँव रहने गये . तब डाक और मेहमानों की व्यवस्था के लिए काका वर्धा में ही मगनवाड़ी में ठहर गये .  कुछ स्थिरता से रहना होगा , ऐसा मानकर काका ने हम लोगों को साबरमती से वर्धा बुला लिया . यह तक किया था कि वर्धा में रहेंगे और मुझे किसी अच्छे स्कूल में दाखिल कराया जाएगा . स्व, जमनालाल बजाज की प्रेरणा से उन दिनों वर्धा में ‘मारवाड़ी विद्यालय ‘ चल रहा था .उसीका नाम आगे चल कर ‘नवभारत विद्यालय ‘  रखा गया था . इस स्कूल में मुझे भेजा गया . शान्ति – निकेतन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के पास काम किये हुए स्व. ई.डब्ल्यू. आर्यनायकम उन्हीं दिनों बापू के पास नये – नये पहुँचे थे और विद्यालय में आचार्य – पद पर काम करने लगे थे .

    एक भाई मुझे विद्यालय में छोड़ आए . गुजरात विद्यापीठ के विनय मन्दिर की पाँचवीं कक्षा पूरी करके वहाँ मैं छठी में गया था , लेकिन यहाँ मुझे सातवीं में दाखिल किया गया यह समझकर कि उसमें मैं साथ चल सकूँगा . बस, यहीं दिक्कतें प्रारम्भ हुईं . गुजरात – विद्यापीठ में मैं हिन्दी भाषा में आगे था . लेकिन यहाँ की हिन्दी कुछ अटपटी लगी . फिर यहाँ के शिक्षक के अंग्रेजी के उच्चारण समझ ही नही पाता था . भूगोल मेरा प्रिय विषय था . लेकिन यहाँ के शिक्षकों ने भूगोल के जितने प्रश्न पूछे , उनमें से एक का भी जवाब मैं सही नहीं दे पाया . मैंने भारत का भूगोल सीखा था . यहाँ प्रश्न पूछा गया था दक्षिण अमेरिका के किसी देश का . क्लास में कुछ समझ में नहीं आता था , यह मुख्य नहीं थी . वास्तव में कठिनाई दूसरी ही थी . स्कूल के वातावरण से थोड़े ही समय में मेरा दम घुटने लगा . वर्ग – शिक्षक के कक्षा में आते ही सारे विद्यार्थी खड़े हो गये . पाठशाला के विनय का यह प्राथमिक पाठ मैं सीखा ही नहीं था . मुझे उसमें गुलामी की गन्ध आयी . गरमी की छुट्टी के बाद स्कूल खुला था , इसलिए छुट्टी के दिन कैसे बिताये , यह वर्ग – शिक्षक हरएक से पूछ रहे थे . उसमें शिक्षक कुछ – कुछ विनोद भी करने लगे . यहाँ तक तो ठीक था . लेकिन १२ – १३ साल के बच्चों के साथ पूरा समय उन्होंने विवाह और तत्सम्बन्धी मजाक की बातें करने में बिताया , यह बात मेरे गले नहीं उतरी . क्लास पूरा होने पर बाहर आया , तो करीब – करीब हर शिक्षक के मुँह में बीड़ी ! अधिकतर शिक्षकों के बदन पर खादी भी नहीं थी . बिना खादी के लोग उन दिनों मुझे किसी दूसरी ही बिरादरी के लगते थे . काका के पास घर लौटने पर पहले तो मैं रो ही दिया और फिर अपना निर्णय जाहिर करते हुए कहा , ‘कुछ भी हो ऐसे स्कूल में तो कभी नहीं पढ़ूँगा .’ काका ने मुझे समझाने की कोशिश की . लेकिन उनके समझाने में उत्साह दिखाई नहीं दिया . पाठशाला का जो वर्णन मैंने उनको सुनाया , उससे उनका उत्साह भी ठण्डा पड़ गया था . उन्होंने अन्त में कहा , ‘ देख तू बापू को यह सब लिख कर बता दे और वे कहें उसके अनुसार निर्णय कर .’ मैंने बापू को पत्र लिखा . उन्होंने बात करने के लिए मुझे सेगाँव बुलाया .

    इस बीच आर्यनायकमजी के पास इस स्कूल में न पढ़ने के मेरे निर्णय की खबर पहुँची . उन्होंने काका से कहा , ‘ बाबला अभी खेलकूद की उम्र का है , इसलिए स्कूल में न जाने का बहाना बना रहा है . मैंने अभी – अभी पाठशाला का चार्ज सँभाला है , तो थोड़े ही दिनों में वातावरण सुधार दूँगा . आज वह स्कूल में नहीं जायगा , तो आश्रम के दूसरे बच्चों की तरह पछतायेगा और आपको ही दोष देने लगेगा .’

    बापू के साथ बात करने आर्यनायकमजी भी सेवाग्राम पहुँचे . घूमते समय बापू की एक ओर मैं और दूसरी ओर आर्यनायकमजी उनकी लकड़ी बनकर चलने लगे . आर्यनायकमजी के साथ बापू की कुछ देर बातें हुईं . तब मैंने बापू से कह दिया , ‘वे विद्वान हैं . उनकी दलीलों का ठीक – ठीक जवाब तो मैं नहीं नहीं दे सकूँगा , लेकिन स्कूल में न जाने का मेरा निर्णय पक्का है .’

    बापू ने मेरी पीठ थपथपाकर कहा , ‘ बस, मुझे तो तेरा यही निश्चय चाहिए . अब तेरा वकील बनकर मैं आर्यनायकमजी को समझा दूँगा . ‘

    इसके बाद की चर्चा में मैं केवल साक्षी बनकर रहा . आर्यनायकमजी की दलीलें सुन लेने के बाद बापू ने कहा , ‘ इस तरह के शिक्षण को त मैं शिक्षण मानने को तैयार नहीं हूँ . किसी भी बच्चे को मैं ऐसे स्कूल में जाने की सलाह नहीं दूँगा . फिर बाबला तो आश्रम का लड़का है और इस स्कूल में न जाने का उसने निश्चय कर लिया है . तो फिर मुझे और अच्छे शिक्षाशास्त्री के नाते आपसे भी इस स्कूल में जाने के लिए उससे कैसे कहा जाय ? ‘

    आर्यनायकमजी की दलीलें बाद में कई दिनों तक चलती रहीं . इस चर्चा का परिणाम यह निकला कि थोड़े ही दिनों में बापू ने नायकमजी को भी नवभारत विद्यालय से छुड़ा कर अपने पास बुला लिया .

    उन दिनों कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल प्रदेशों में बन चुके थे . कांग्रेस सरकारें सोच रही थीं कि शिक्षा में क्या परिवर्तन किया जाय . भारत की शिक्षा – प्रणाली सिर्फ किताबी तो होनी ही नहीं चाहिए , प्रत्यक्ष उद्योग के साथ वह जुड़ी होनी चाहिए . इतना ही नहीं , बल्कि उस शिक्षण में से ही पाठशाला का खर्च निकल आना चाहिए , इत्यादि विचार बापू ‘ हरिजन ‘ पत्र में प्रस्तुत करने लगे थे . इन विचारों के पीछे बापू का जीवनभर का अनुभव , गहरा चिन्तन और दीर्घ दृष्टि थी . एक वर्ष के विचार – मंथन के बाद ‘नयी तालीम शिक्षा – पद्धति’ सामने आयी , जिसका दुनियाभर के शिक्षा-विशेषज्ञों ने उत्तम पद्धति के तौर पर स्वागत किया है .

    बापू की खूबी यह कि उन्होंने इस शिक्षा – पद्धति का प्रयोग अपनी संस्था में करने के लिए आर्यनायकम-दंपति को पकड़ा और आज ये दोनों नयी तालीम शिक्षा – प्रणाली के विश्वविख्यात आचार्य बने हैं . [श्री आर्यनायकमजी अब जीवित नहीं है . श्रीमती आशादेवी आर्यनायकम यह कार्य चला रही थीं,वह भी अब जीवित नहीं हैं .]

    चालू विद्यालय में न पढ़ने का मेरा निर्णय तो स्वीकृत हो गया , लेकिन प्रश्न यह था कि अब मेरी पढ़ाई कहाँ और कैसी हो ? मुझे कैसे सूझा पता नहीं, लेकिन मैंने बापू से कह दिया , ‘ आपके साथ रहूँगा , आपका काम करूँगा , और उसमें से जो सीखने को मिलेगा , सीखूँगा . ‘

    बापू ने मेरे इस विचार को भी मेरे वकील की तरह उठा लिया . उनकी चर्चाओं में से ही शायद यह विचार सूझा होगा , ऐसा आज मुझे लगता है .

    कौन – सा काम ? कौन – सी पढ़ाई ? किस तरह की शिक्षा ? इन सब प्रश्नों का उत्तर उसी समय कैसे मिल सकता था ! लेकिन बापू ने यह फैसला किया कि ‘ बाबला महादेव के साथ रहेगा , महादेव सौंपे वह काम करेगा और वह जो पढ़ायेगा सो पढ़ेगा . ‘

    महात्मा के मन्त्री को ‘ पीर , बबर्ची ,भिस्ती,खर’ तो बनना ही पड़ता है . लेकिन अपने बच्चे का पूरे समय का शिक्षक बनने की जिम्मेवारी भी उसके सिर पर आयी .

    काका ने यह जिम्मेवारी तो उठा ली , लेकिन साथ ही मुझसे कहा , ‘ देख बाबला , आश्रम के अनेक लड़कों को आश्रम की पढ़ाई से असंतोष था और वे अंग्रेजी पढ़ने के लिए आश्रम छोड़कर गये , यह तू जानता है . तेरे सामने अनेक उदाहरण हैं . अपनी ओर से मैं इतना कह देता हूँ कि तुझे चाहे जब , जिस उम्र में भी , बाहर का चालू शिक्षण प्राप्त करने के लिए जाने की इच्छा हो जाए , तो मन में यह संकोच नहीं करना कि मैंने ही निश्चय किया था तो मैं ही उसे कैसे तोड़ूँ . तुझे निश्चय करने का अधिकार है तो उसे बदलने का भी अधिकार है . तू यदि चालू शिक्षण लेने के लिए गया तो मैं बाधक नहीं बनूँगा . इतना ही नहीं , बल्कि यथासम्भव सारी सहूलियत उसके लिए कर दूँगा . साथ ही आज के तेरे निश्चय को डिगाने का प्रयास भी मैं अपनी ओर से नहीं करूँगा . मेरे साथ रहकर तेरी जितनी पढ़ाई हो सकती है , उतनी कराने का प्रयत्न करूँगा . लेकिन मुख्यतया तुझे ही अपनी शिक्षा प्राप्त करनी होगी . मेरी मदद रहेगी , मेहनत तुझे करनी होगी . ‘

    इस दिन से मेरी पढ़ाई का नयी तालीम की राष्ट्रीय धारा के साथ संगम हो गया .

बापू की प्रयोगशाला

 सैकड़ों सालों की कंगाली के परिणामस्वरूप अज्ञान का बोझ ढोते – ढोते भारत की ग्रामीण जनता के सामाजिक जीवन को एक प्रकार का लकवा मार गया था। उसमें किसी भी घटना या प्रसंग से चेतना जाग ही नहीं सकती थी। ग्रामीण जनता की शुष्क भूमि में से आर्द्रता का रहा – सहा अंश भी बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में मानो सूख गया था। वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही अभूतपूर्व आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। लेकिन प्रेसिडेन्ट रूजवेल्ट के नेतृत्व में अमरीका उस संकट को पार करके आगे बढ़ने लगा था। इस परिस्थिति में ही जर्मनी में हिटलर पैदा हुआ था। राजनीतिक दृष्टि से १९३२ – ३४ के आन्दोलन के बाद भारत आराम की साँस ले रहा था। लेकिन कोई नया आन्दोलन छिड़ने के लक्षण देश में नहीं दीख रहे थे। आर्थिक दृष्टि से देश की स्थिति स्वाभाविकतया अधिक बिगड़ गयी थी।    इसी समय बापू ने अपने कदम गाँवों की ओर बढ़ाये। उनका रास्ता कष्टमय , लम्बा और तरह – तरह की कठिनाइयों वाला था।

    क्या थी गाँवों की दशा ? गुजरात में रहनेवाले तो इसकी कल्पना ही नहीं कर सकेंगे। दरिद्रता में से सिर ऊँचा करने की ताकत खो बैठे , ये गाँव ! अस्वच्छता और बीमारियों का घर बने और सैकड़ों वर्षों का अज्ञान भरे !

    वर्धा में मगनवाड़ी में रहते थे , तभी से बापू ने पड़ोस के सिन्दी गाँव में सफाई का काम शुरु कर दिया था। मैं मगनवाड़ी में रहने गया , तब बापू सेगाँव जा चुके थे। सिन्दी गाँव की सफाई में बापू की जगह काका जाने लगे थे। शहर से लगा हुआ वह गाँव था , न कि रेलवे से दूर किसी जंगल का। लेकिन उस गाँव के लोग कई महीनों तक गांधीजी , महादेवभाई और उनके साथियों को गाँव की सफाई करनेवाले भंगी-से ही मान बैठे थे। हाँ , ये भंगी पैसे नहीं लेते थे , यह लाभ जरूर था। एक आदमी हाथ में लोटा लिये शौच करके आ रहा था। उसने उँगली से इशारा करते हुए काका से कहा,’अरे, उस तरफ जाओ,वहाँ अधिक गन्दगी है -’ त्या बाजूला जा , तिकडे जास्त घाण आहे।

    साबरमती – आश्रम में मेरी बारी आती ,तब मैं संडास-सफाई का काम करता था। लेकिन वहाँ संडास की बालटियों को खाद के गढ़ों में डालने और नारियल के झाडू से बालटियाँ साफ करने का काम था। यहाँ तो बिना ढँका हुआ ताजा मैला फावडे से या टीन के टुकड़े से सीधे उठाने का काम था। कुछ जगहों पर तो पुराने मैले में कीड़े बिलबिलाते थे , उसको उठाना एक कठिन परीक्षा थी। लेकिन काका निष्टापूर्वक वह काम किये जा रहे थे।

    एक दिन रविवार को मैंने बापू से पूछा,’ बापूजी, ऐसे काम से क्या लाभ है? गाँव वालों पर तो कोई असर ही नहीं हो रहा है। उलटे हमारे पास आकर जहाँ-जहाँ मैला पड़ा होगा , वहाँ – वहाँ जा कर उठाने का हुक्म छोड़ते हैं।’ बापू ने कहा ,’ बस,इतने में ही थक गया ? महादेव को पूछ, वह कब से सफाई कर रहा है। महादेव के काम में भक्ति है,वह तुझमें आनी चाहिए। अस्पृष्यता का कलंक ऐसा-वैसा नही है। उसको मिटाने के लिए हमें दीर्घ तपस्या करनी पड़ेगी।’

   लेकिन इतनी दलील से मेरा समाधान कैसे होता ! मैंने कहा ,’बापू, उनमें कोई सुधार ही न होता हो तो सफाई से लाभ ही क्या है ? ‘ बापू ने चर्चा को एक नया मोड़ देते हुए कहा ,’ सफाई करनेवाले का तो लाभ होता है न ? उसको तालीम मिल रही है।’ मैंने कहा ,’तालीम तो गाँववालों को भी मिलनी चाहिए।’ बापू हँसकर बोले , ‘ तू वकील है,वकील। तेरे कहने में सार जरूर है। उन लोगों को तालीम देना हम को आ जाए, तो मैं नाचूँगा।’ अपनी बात आगे बढ़ाते हुए बापू ने कहा , ‘ तेरी जगह मैं होता तो ध्यान से देखता। कोई शौच करके उठा हो तो तुरन्त वहाँ दौड़ जाता। उसके मैले में खराबी नजर आती , तो उससे नम्रतापूर्वक कहता,’ देखो भाई, तुम्हारा पेट बिगड़ा है। तुमको अमुक इलाज करना चाहिए। इस तरह उसका हृदय मैं जीत लेता।’

    मैं चुप हो गया। यह देखकर बापू का उत्साह बढ़ा। उन्होंने कहा , ‘ मेरा बस चले तो उस रास्ते को झाड़ू लगाकर  साफ-सुथरा कर दूँ। इतना ही नहीं, बल्कि वहाँ फूल के पौधे लगा दूँ। रोज पानी दूँ और आज जहाँ घूरा है , वहाँ सुन्दर-सा बगीचा बना दूँ। सफाई का काम एक कला है, कला।’

    निजी तौर पर सेगाँव के काम को बापू ने हाथ में लिया था , तो सामाजिक तौर पर उन्होंने अपने संस्थागत प्रयोग भी शुरु कर दिये थे। मगनवाड़ी में अखिल भारत ग्रामोद्योग संघ का मुख्य दफ्तर था। लेकिन बापू ने जिन संस्थाओं की स्थापना की , उनका मुख्य दफ्तर उस क्षेत्र की एक प्रयोग-शाला ही बन जाती थी। मगनवाड़ी में एक तरफ तेल घानी चलती थी , तो दूसरी तरफ हाथ – कागज बन रहा था। वाड़ी में जगह – जगह मधुमक्खी – पालन की पेटियाँ दिखाई दे रही थीं। विविध प्रकार की आटा पीसने की चक्कियों के प्रयोगों में खुद बापू भी भिड़ जाते। इन उद्योगों के साथ-साथ ग्रामोद्योगों की तालीम देने के लिए विद्यालय भी चलाया जा रहा था। देश – विदेश में अर्थशास्त्र की विद्या पढ़ने के बाद , ‘ भारत के अर्थशास्त्र की कुंजी तो ग्रामोद्योगों में ही है ‘ इस श्रद्धा से बैठे हुए जे.सी. कुमारप्पा और उनके छोटे भाई भारतन कुमारप्पा तो मगनवाड़ी की शोभा थे। जे.सी. कुमारप्पा के ओजस्वी सम्पादकत्व में ‘ ग्रामोद्योग पत्रिका ‘ नामक साप्ताहिक भी प्रकाशित होता था। मेरे पिताजी विनोद में कुमारप्पा को कई बार ‘अहिंसा के हिंसक प्रतिपादक’ ( Violent exponent of non-violence ) कहते थे।

    इन प्रयोगों के साथ बापू के रसोई के प्रयोग भी चलते थे। उन दिनों सोयाबीन में अमुक – अमुक गुण हैं इत्यादि चर्चा बहुत होती थी। इसलिए सोयाबीन के प्रयोग शुरु हुए। लेकिन थोड़े दिनों के बाद उत्साह कम हुआ और वे प्रयोग बन्द हो गये। सूरजमुखी के तेल का प्रयोग , फिर कडुवे नीम की पत्तियों की चटनी के प्रयोग , इमली के प्रयोग इत्यादि। बापू कहते थे , ‘इमली तो गरीबों का फल है। भारत के लाखों देहातों को उसका लाभ मिल सकता है। लेकिन उसका उपयोग जीभ के स्वाद के खातिर करने के बदले शरीर – पोषण के लिए किया जाना चाहिए।’ इन प्रयोगों के अलावा चूल्हों के अलग – अलग प्रयोग। किस प्रकार के चूल्हे में कम लकड़ियाँ खर्च होती हैं , यह देखने में बापू को बहुत रस रहता था। कुछ दिनों के बाद देशी तेल से जलने वाली लालटेनों के भी प्रयोग चले। इन प्रयोगों में से जो शोध हाथ में आए , उन्हींके परिणामस्वरूप ‘ मगन चूल्हा ‘ और ‘ मगनदीप ‘ का अविष्कार हुआ। नीरा से गुड़ बनाने और खजूर के पत्तों से अन्य चीजें बनाने के प्रयोग भी होते थे।

    उस समय के ग्रामोद्योग – संघ ने ऐसे कार्यकर्ता तैयार किए , जिनकी ग्रामोद्योगों में गहरी निष्ठा हो गयी। आज देश में जहाँ कहीं भी ग्रामोद्योगों की अच्छी प्रवृत्तियाँ चलती दिखाई देती हैं , वहाँ ऐसा कोई कार्यकर्ता जरूर मिलेगा , जो मगनवाड़ी की हवा खाकर आया हो।

    खादी के प्रयोग ग्रामोद्योगों से आगे बढ़े हुए थे। उन दिनों खादी के अर्थशास्त्र की दृष्टि से एक महत्व का प्रस्ताव चरखा – संघ ने किया था , वह है कत्तिन – बुनकरों को जीवन – वेतन देने का प्रस्ताव। वर्धा और चांदा जिले में खादी का काम अधिक होता था। लेकिन बापू ने देखा कि दिनभर कताई करके भी कत्तिन को सिर्फ सवा आना मिल रहा है , तो वे काँप उठे। चरखा – संघ की बैठक बुलाकर कताई की दर बढ़ाने की बात बापू ने आग्रहपूर्वक रखी। बापू ने कहा कि आठ घण्टे के काम की मजदूरी कम-से-कम आठ आना कत्तिन को मिलनी चाहिए ( यह १९३६ की बात है ) । खादी के व्यवहार-कुशल लोगों ने हिसाब जोड़कर खादी के भाव कितने बढ़ जाएंगे , यह बताना शुरु किया। आखिर आठ घण्टे में तीन आने मजदूरी देने का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। विनोबा ने इस प्रस्ताव पर एक लेख लिखा था , जिसका शीर्षक था – ‘ अथातो न्यायारम्भ:’ ( अब न्याय का प्रारम्भ हुआ )। खादी के भाव दुगुने बढ़े , लेकिन उसकी खपत में ५० प्रतिशत की कमी हुई हो , ऐसा अनुभव नहीं आया। लाखों कत्तिनों के पेट आधे भर गए। इन दिनों बापू की हालत उन स्वामीजी के जैसी हो गयी थी , जिनके बदन में सामने की गली में जाड़े से ठिठुरते हुए भिखारी को देख कर ठण्ड लग रही थी। स्वामीजी के बदन पर एक के बाद एक कपड़ा डाला जा रहा था , लेकिन उनका ठिठुरना कम नही हो सका। अन्त में उस भिखारी के बदन को ढाँका गया , तब कहीं स्वामीजी की ठण्ड दूर हुई। इस तरह बापू की भूख कत्तिनों की मजदूरी बढ़ने के बाद ही मिटी। बापू ने ग्रामीण जीवन की ओर ध्यान देना शुरु किया , तब से उनकी हर प्रवृत्ति की एक ही कसौटी रहती थी – क्या इससे देश के दरिद्रनारायण के पेट भर सकते हैं ? किसी कुशल गायक के कंठ से निकले स्वरों के साथ पास में पड़े हुए तन्तुओं के तार झनझनाते हैं , वैसे बापू की हृदय-वीणा के तार देश के दरिद्रनारायण की वेदना के स्वर से झनझनाते थे।

यज्ञसंभवा मूर्ति

यरवड़ा – जेल का लोहे का दरवाजा खुला , और दूसरा बन्द हुआ। फिर दूसरा खुला , तब पहला बन्द हुआ। खाकी वर्दीधारी पुलिस और पीली टोपीवाले वार्डरों के बीच से हम अन्दर गए। सामने दिखाई देती थीं ऊँची दीवालें और उनके बीच बन्दी आकाश। दोनों ओर ईंटोंवाली सड़क और एक – दो पेड़। एक – दो पगडण्डियों से होते हुए एक बड़ी दीवाल पार कर हमारा अंदर प्रवेश हुआ। वहाँ एक छोटा मैदान था। उसमें एक छोटा – सा आम का पेड़ था। उसकी छाया के नीचे खटिया पर दुबले – पतले देहधारी बापू सोये हुए थे। चरण – स्पर्श करके हम बगल में खिसक गए। हमेशा की तरह ‘ क्यों सेठिया ‘ कहकर पीठ पर मुक्का लगाने जितनी ताकत तो उस क्षीण देह में थी नहीं , लेकिन मुँह पर जरा – सी मुसकान आयी। दुनिया की सम्पूर्ण पाशवी शक्ति के सामने निर्भयता से आत्मिक शक्ति का झण्डा फहरानेवाली वह मुसकान थी।    बापू के उपवास का वह सातवाँ दिन था। तीन – सप्ताह के उपवास सहजता से खींच ले जाने वाले बापू का शरीर सातवें दिन ही क्षीण हो गया था और कितने घण्टे तक उपवास चल सकेगा , ( यानी बापू जीवित रह सकेंगे ) यही सबके सामने प्रश्न था। ‘अस्पृश्यों को अलग मताधिकार दिया जाएगा , तो उसका विरोध प्राण की बाजी लगा कर मैं करूँगा। ‘ – ये शब्द लन्दन की गोलमेज परिषद में बापू ने कहे , तब बापू को न जानने वालों ने उसको भाषा का अलंकार समझ लिया था। बापू जो कहते हैं वही करते हैं , यह जाननेवालों ने उसको धमकी माना होगा। लेकिन बापू के लिए यह जीवन – मरण का प्रश्न था। अस्पृश्यों को दोहरा मतदाता – मण्डल देकर उनको कायम के लिए अस्पृश्य बनाये रखने की व्यवस्था हो रही थी। हमेशा अस्पृश्यों का पक्ष लेनेवाले बापू इस समय अस्पृश्यों को दोहरा मतदाता – मण्डल नहीं मिलना चाहिए यह आग्रह कर रहे थे , तो दूसरी तरफ अस्पृश्यों के नेता बने हुए भीमराव अम्बेडकर इस उधेड़बुन में थे कि दोहरा मताधिकार गांधीजी ने अगर रुकवा दिया तो उसके बदले अधिक – से – अधिक कितना अधिकार अस्पृश्यों के लिए प्राप्त किया जा सकेगा। मालवीयजी के नेतृत्व में देश के हिन्दू नेता एकत्र होकर बम्बई में तो कभी पूना में विचार – विमर्श कर रहे थे। उधर शिमला में उच्च स्तरों में सलाह – मशविरा हो रहा था और यहाँ के सब समाचार इंग्लैंड के शासकों तक पहुँचाकर उनसे सूचनाएँ प्राप्त की जा रही थीं।

    लम्बी चर्चाओं के अन्त में किसी भी समझौते की वार्ता में बरती जानेवाली उदारता से अधिक उदारता का रुख अपनाकर अबेडकर को मनाया गया था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने जाहिर वचन दिया था कि उनके निर्णय में तभी परिवर्तन हो सकता है, जब सारे हिन्दू – नेता एक राय हो जाँए। लेकिन लन्दन से को ई लिखित सम्वाद बापू के पास नहीं पहुँचा था। पूना में और सारे देश में यह अफवाह फैल गई थी कि इस तरह का हुक्म लन्दन से रवाना हो चुका है। लेकिन जिसके जीवित रहने के लिए एक – एक क्षण महत्व का बन गया था , उसके पास यह हुक्म पहुँचाने में पता नहीं कौन सी लाल-फीताशाही आड़े आ गयी थी !!

    चारों ओर से साथी आ पहुँचे थे। सरदार , राजाजी , राजेन्द्रबाबू , सरोजिनी और कमला नेहरू। काका और देवदासभाई तो लगातार भागदौड़ कर रहे थे।

    किसीने पूछा , ‘ गुरुदेव अब तक पहुँच जाने चाहिए थे। वे नहीं आए ? ‘

    ‘ शायद उनको जेल के बाहर पुलिस ने रोका होगा , देवदास , जाओ तो देख आओ। ‘

    सचमुच गुरुदेव की मोटर को पुलिस ने बीच में रोक लिया था। देवदासकाका यदि समय से न पहुँचे होते तो और देर हो जाती।

    गुरुदेव बापू के पास पहुँचे तो बापू ने उनको दीर्घ समय तक छाती से लगा लिया। हमेशा की तरह झुककर प्रणाम करने का यह अवसर नहीं था।

    काका बोले , ‘ बहुत अच्छा हुआ आप आ गये। बापू चातक की तरह आपकी राह देख रहे थे। ‘

    ‘ मेरे आने से देश की समस्या हल होने में कुछ मदद होगी , ऐसा मानने की भूल मैं नहीं करूँगा। लेकिन मेरे आने से बापू को सन्तोष हुआ , यह मेरे लिए आनन्द की बात है। ‘

    अधिक बातचीत नहीं हुई। गुरुदेव बापू की खटिया के पास थोड़ी देर बैठे और बाद में दूर एक कोने में जाकर बैठ गये। बापू का शरीर क्षीण हो गया था लेकिन उनका चित्त क्षीण नहीं था। राजनीतिक नेताओं के साथ की चर्चा में पहले की तरह वे गहराई में जाते थे। गुरुदेव के साथ प्रत्यक्ष बातचीत भले ही नहीं हो रही थी , लेकिन उन दोनों में आत्मिक अनुसंधान चालू था। मृत्यु की वेदी पर सोये हुए इस महात्मा का स्वर आज भारत की कोटि – कोटि जनता तक पहुँच चुका था। जेल की दीवारें , राजनीति-पटु लोगों की चालें,या सैकड़ों वर्षों से चली आयी अन्य मान्यताएँ महात्मा के इस स्वर को रोक नहीं सकीं। इसी कारण सारा भारत इस चिन्ता में था कि किस प्रकार समझौता हो और कौन – से प्रायश्चित से महात्मा के प्राण बच जायँ।

    जेल में उनके चारों ओर बैठे लोगों में बहुत – से सत्याग्रही भी थे। उनके चेहरों पर से चिन्ता टपकती थी , लेकिन किसी का भी चेहरा म्लान नहीं था। उनके चारित्र्य का असर जेल के अधिकारियों पर पड़ा था। इसीलिए जेल के अन्दर बेखटके घूमने की उनको इजाजत मिली थी। किसी भी सत्याग्रही ने इसका दुरुपयोग नहीं किया था।

    बापू के इस राष्ट्रशुद्धि के यज्ञ के साथ मेरा भी चित्त्शुद्धि का यज्ञ हो गया। गत चरखा – द्वादशी के दिन मैंने कताई किये बगैर ही आश्रम के रजिस्टर में झूठ्मूठ तार लिखवा दिये थे। यह बात किसीने काका से कह दी। ‘ क्या तू झूठ बोला ? तुझसे ऐसी अपेक्षा नही थी। ‘ – काका ने दर्दभरे स्वर से कहा। और मेरी आँखों से आँसुओं ने टप – टप टपककर प्रायश्चित कर लिया।

    आखिर जेल के अधिकारी सरकारी दूत के साथ के साथ हाजिर हो गये। उनके चेहरे पर आनन्द नाच रह था। बापू ने गम्भीरता से सरकारी पत्र पढ़ा , फिर दूसरों को पढ़ने दिया। उस पत्र से सबको सन्तोष हुआ। फिर भी पं. हृदयनाथ कुंजरू को वह पत्र दिया गया और उसके एक – एक शब्द की बारीकी से छानबीन की गयी। बापू को इस छानबीन से सन्तोष हुआ। फिर भी उपवास छोड़ने का निर्णय करने से पहले वह सरकारी पत्र बापू ने अम्बेडकर को बताया। उनकी स्वीकृति मिली , तब अनशन तोड़ने का निर्णय लिया गया। कमलादेवी नेहरू नारंगी का रस लायीं। उपवास की समाप्ति कस्तूरबा के हाथ से हो , इस दृष्टि से रस का गिलास उनके हाथ में दिया गया। प्रार्थना की गयी। ऐसी प्रार्थना में उपस्थित रहने का अवसर मिलना एक सौभाग्य की बात थी।

    गुरुदेव ने अपने कोमल , करीब – करीब नारीतुल्य स्वर में ‘ जीवन जखन शुकाये जाय , करुणा धाराय एशो ‘ यह गीत गाया। इस गीत का मेरे काका द्वारा किया गया गुजराती अनुवाद यहाँ दिये बगैर रहा नही जाता –

       ” जीवन जब सुकाई जाय

                      करुणा वर्षतां आवो।

          मधुरी मात्र छुपाई जाय

                        गीत सुधा झरतां आवो।

           कर्मनां ज्यारे काळां वादळ

                       गरजी गगड़ी ढांके सौ स्थल।

           हृदय आंगणे हे नीरवनाथ-

                        प्रशान्त पगले आवो !

             मोटुं मन ज्यारे नानुं थई ,

                         छुपाई जाये ताळुं दई

             ताळुं तोडी , हे उदार नाथ

                        वाजतां गाजतां आवो।

              काम – क्रोधनां आकरां तुफान

                              आंधळां करी भुलावे भान।

                हे सदा जागन्त, पाप धुवन्त।

                           बीजली चमकतां आवो !

    हिन्दी रूपान्तर :

                     जीवन जिस दिन रीते उस दिन

                                          करुणा धारा बन आना

                        सकल माधुरी बीते जिस दिन

                                         गीत सुधा-रस बरसाना !

                        कर्म प्रबल आकार धरे जब

                                         गरजे – तरजे दिशा भरे सब

                          हे जीवन-प्रभु शान्त चरण से

                                       मन का आँगन सरसाना !

                         दीन हीन मन जब कोने में

                                       सुख माने छुपकर रोने में

                          गाजे-बाजे से उदार हे

                                            द्वार खोलकर मुसकाना !

                           उठे वासना की आँधी जब

                                            पंथ – कुपंथ नही सूझे तब

                            हे पवित्र तुम हे अनिद्र तुम

                                            रुद्र-किरण बनकर छाना !

    इसके बाद मोटी बा ( कस्तूरबा ) ने बापू को नारंगी का रस धीरे -धीरे पिलाया। फिर वहाँ उपस्थित सब लोगों ने मिलकर “वैष्णवजन” भजन गाया –

   वैष्णवजन तो तेने कहीये, जे पीड पराई जाणे रे।

   परदु:खे उपकार करे तोये , मन अभिमान न आणे रे।

    सबको फल और मिठाई की प्रसादी बाँटी गयी। बापू के उपवास-यज्ञ की यह फलश्रुति थी। इस प्रसंग का शान्ति-निकेतन के अपने साथियों को सुनाते हुए गुरुदेव ने कहा था , ‘ प्राणोत्सर्ग का यज्ञ कारागृह में शुरु हुआ , उसकी सफलता वहीं पर मूर्तिमन्त हुई और मिलन की वह अकस्मात आविर्भूत हुई अपरूप मूर्ति -इसीको यज्ञसम्भवा कहते हैं।’

अग्निकुण्ड में खिला गुलाब

‘ गांधी- सेवा- संघ ‘ की बैठकें हर साल अलग – अलग प्रान्तों में होती थीं। ऐसी ही एक बैठक में बापू के हाथ से मेरा यज्ञोपवीत – ग्रहण समारोह और मेरी बूआ का विवाह सम्पन्न हुआ था। सन १९३८ में गांधी-सेवा-संघ की बैठक उड़ीसा के पुरी जिले केडेलांग गाँव में हुई थी। आम तौर पर काका के साथ ऐसी सभाओं में मैं जाता था। लेकिन जगन्नाथपुरी के पास ही डेलांग होने के कारण मेरि माँ वहाँ आयी थी।    सम्मेलन के सभापति किशोरलाल मशरूवाला थे। उन्होंने अहिंसा-सम्बन्धी कुछ दिलचस्प सवाल कार्यकर्ताओं के सामने उपस्थित किए थे। बापू सम्मेलन में तो बोले हि थे , उसके उपरान्त रोज प्रार्थना के बाद उनको जाहिर सभा में जाना होता था। फिर दिनभर में एक – दो बार दर्शन के लिए इकट्ठा हुई हजारों की भीड़ के सामने भी बापू को हाजिर होना पड़ता था। वह दृश्य अद्भुत था। रोज सुबह – शाम एक मैदान में हजारों लोगों की भीड़ जमा होती थी। इतनी संख्या लोगों के होते हुए भी जरा भी अशान्ति नहीं रहती थी। कभी – कभी दर्शनार्थी घण्टों तक बैठे रहते। बापू उनके बीच मंच पर जाकर केवल प्रणाम करके चले आते थे। बस , इतने-से दर्शन से अपार तृप्ति का अनुभव करती हुई ग्रामीण जनता रात होने से पहले दूर के अपने – अपने गाँवों में पहुँचने के लिए जल्दी – जल्दी निकल पड़ती।

    प्रदर्शनी के उदघाटन के सम्य हजारोम की संख्या में भीड़ जमा हो गयी थी। इस भीड़ के सामने भाषण करते हुए बापूने पुरी के मन्दिर का जिक्र किया और कहा , ‘ जब तक यह मन्दिर हरिजनोम के लिए खुला नहीं किया जाता , तब तक जगन्नाथ सही माने में जगत का नाथ नहीं कहा जाएगा , बल्कि मन्दिर की छा में पेट भरने वाले पण्डों का नाथ कहा जाएगा। ‘ हरिजन – यात्रा के सम्य बापू का प्रवेश पुरी के मन्दिर में नहीं हो सका था , उल्टे उन पर हमला किया गया था।

    कस्तूरबा ने इच्छा व्यक्त की कि डेलांग आये ही हैं , तो पुरी चला जाए। मेरी माँ और बेला मौसी तो इसीलिए आयीं थीं। इन सबको पुरी भेजने की व्यवस्था करने को बापू ने काका से कह दिया। काका को पुरी जाने में विशेश दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन बापू ने दो – तीन बार कहा तो काका ने व्यवस्था कर दी। पुरी जाने वालोम में मैं भी एक था। हमारे साथ मणिलालकाका भी जायें , ऐसा तय हुआ था। लेकिन उनका स्वास्थ्य खराब हो गया या ऐसा ही कुछ कारण बना और वे हमारी पार्टी में नही जुड़े।

    बापू ने स्मझा था कि कस्तूरबा पुरी गयी है , तो समुद्र-स्नान करके वापस आएगी। लेकिन बा के मन में पुरी जाने का हेतु जगन्नथजी के दर्शन करने का था। काका को लगा कि ( हरिजन-प्रवेश जिसमेम निषिद्ध है ऐसे ) मन्दिरोम में बापू खुद भले न जाते हों , लेकिन उनकी अहिंसा की साधना में दूसरोम के प्रति जो असीम उदारता का भाव रहता है , वह इन्लोगों को मन्दिर-प्रवेश करने से रोकेगा नहीं। मेरी माँ के सम्बन्ध  में काका को मालूम ही था कि वह अस्पृश्यता नहीम मानती है। हमारे घर मेम कई वर्षों से हरिजन रहते आए हैं। इसलिए वह यदि मन्दिर में जाना चाहती हो , तो उसकी श्रद्धा को क्यों धक्का लगाया जाय ? ऐसा कुच सोचकर कका ने माँ को मन्दिर जाने से नहीं रोका।

    हम लोग पुरी गये। समुद्र मेम नहाये। सारा शहर घूमे। फिर मन्दिर गये। मन्दिर के दरवाजे पर नोटिस लगी थी कि ‘ हिन्दुओं के सिवा अन्य किसीको मन्दिर में प्रवेश करने की मनाही है। ‘ यह नोटिस देखकर मैं और लीला बूआ रुक गये। मेरी माँ , कस्तूरबा , बेला मौसी और दूसरे कुच भाई – बहन अन्दर गए। मैं बाहर खड़ा रहकर पन्डों के साथ बहस करने मेम लग गया। पण्डों ने मुझे समझाने की कोशिश की कि अस्पृश्य ब्रह्मा के चरणों में से पैदा हुए हैं और ब्राह्मण ब्रह्मा के मस्तक में से पैदा हुए हैं , इसलिए अस्पृश्य ब्राह्मणों से निम्न श्रेणी के हैं। मैंने यह मानने से इनकार किया और कहा कि भगवान के सामने तो सभी बालक समान होते हैं।

    बा आदि मन्दिर मेम से वापस आए तो उनके चेहरों पर सम्पूर्ण तृप्ति का भाव था। हम सब वापस लौटे। हमारी पार्ती में कुछ लोग दो मुँह वाले थे। मन्दिर में जाने में वे सबसे आगे थे उअर बापू के पास जा कर चुगली करने में भी वे आगे थे। ‘ बापू, सारे पुरि शहर में इसकी चर्चा है कि क्स्तूरबा मन्दिर में जाकर आयीं। पुरी के स्ट्शन मास्टर ने भी हम से पूछा कि क्या सचमुच मिसेस गांधी मन्दिर में गयीं ? ‘

    बापू को आशा थी कि कस्तूरबा पुरी जा रही है , लेकिन मन्दिर में नहीम जाएगी। और जाना चाहे तो महादेव ने मन्दिर-प्रवेश के सम्बन्ध में मेरी मर्यादा बा को समझा कर उसको पुरी भेजा होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ था। इससे बापू को सख्त सदमा पहुँचा। बापू बोले , ‘ महादेव, हम तीनों को तो अब तलाक लेना पड़ेगा। ‘ लेकिन इसमें विनोद की अपेक्षा वेदना अधिक थी। बापू का रक्तचाप इतना बढ़ गया कि सबको चिन्ता होने लगी। माँ और काका को बुलाकर कहा , ‘ महादेव , तुमने बड़ी भूल की है। तुमने खुद के साथ , मेरे साथ और दुर्गा (मेरी माँ) के साथ अन्याय किया। तुम्हारा धर्म था कि तुम इन लोगों को पिछला इतिहास सुनाते। पुरी में क्या दशा के गयी थी वह भी बताते , वह सुनकर भी यह मन्दिर जाना चाहती तो मेरे पास उनको ले आते। फिर भी वे न मानतीं तो जाने देते। जबरदस्ती का प्रश्न नहीं था , लेकिन समझाना तो चाहिए था। ‘

    काका को अपनी गलती महसूस हुइ , लेकिन उनको लगा कि यह सब गलतफ़हमी के कारण हुआ है। इसमेम बापू को इतना सदमा क्यों पहुँचना चाहिए, यह उनकी समझ में नही आ रहा था। काका ने यह बात गांधी-सेवा-संघ के सदस्यों के सामने रखी। बापू ने भी अपनी वेदना प्रकट की – ‘ बा मन्दिर में न जाते तो मैं गज ऊँचा चढ़ जाता। उसके बदले मैं नीचे गिरा। जिस ताकत से मेरा काम चल रहा था, उसीका मनो ह्रास हुआ , ऐसा मुझे लगा। इन लोगों का अज्ञान था,इसमें कोई शक नहीं। लेकिन उनको अज्ञान में किसने रखा ? हमने ही न ? उस अज्ञान को दूर न करने में अहिन्सा नहीं बल्कि हिन्सा है। आज वे हरिजन मानते ही हैं कि हम उनको ठग रहे हैं और वे ऐसा क्यों नहीं मानेंगे ? हम तो मन्दिर में जाते हैं , हरिजनों को जहाँ प्रवेश नहीं है ऐसे स्थानों का उपयोग करते हैं , तो ये कैसे समझेंगे कि हमने हरिजनों को अपनाया है ? ‘

    इस भाषण से काका को अपने प्रति बहुत ग्लानि हुई – ‘अस्पृश्यता जैसे प्रश्न पर यदि मेरी इतनी गम्भीर गलतफ़हमी हुई हो तो मैं गांधीजी के विचारों को समझाने के काबिल नहीं। मैंने ही बापू को इतनी पीड़ा पहुँचाई तो दूसरों को रोकने का मुझे क्या अधिकार ? ‘

    रातभर सब जागते रहे। काका रोये , माँ रोयी , बा रोयी। बापू रो तो नहीं सकते थे , लेकिन उनका ब्ल्ड-प्रेशर ऊँचा हो गया। काका ने बापू का साथ छोड़ने का विचार किया। मैं सुबह उठा तो परिस्थिति की गंभीरता का अधिक भान हुआ। काका कहने लगे,’बाबला, हम घर जायेंगे। मैं खेती करूँगा और तुझे पढ़ाऊँगा।’

    मैंने साफ इनकार करते हुए कहा ,’ आपको जानाहो तो जाइये , मैं तो नहीं जाऊँगा।’ माँ ने भी काका के निर्णय का समर्थन नही किया।

    बापू तो सुनने को ही तैयार नहीं थे। बोले , ‘ अभक्त के हाथ से जीने की अपेक्षा भक्त के हाथ से मरना कहीं बेहतर है। अन्ध-प्रेम के कारन तुमने पत्नी के भ्रम का साथ दिया। तुमको तो अपनी भूल पहचान कर दूसरे रोज इस संघ को लेकर पुरी जाना चाहिए था। उसके बदले रोते बैठे। यह कैसी कायरता ? ‘

    काका ने बापू के पास से जाने का विचार छोड़ दिया। इस घटना के बाद ‘ हरिजन-बन्धु ‘ में उन्होंने जो लेख लिखा , उसमें यह विचार प्रकट किए –

    ‘ बार-बार मुझे लग रहा था कि जरा-सी गलतफ़हमी के कारण यह सारा प्रसंग बना। बड़े-से-बड़े पापरूपी हलाहल को शिवजी की तरह पी जाने वाले बापू इस एक बुद्धिदोष को लेकर इतने क्यों बिगड़ गए ? इस तरह तो तिल का पहाड़ हो जाता है।…. उस समय मुझे ऐसा ही लग रहा था। लेकिन आज शान्त-चित्त से सोचता हूँ , तो लगता है कि मैं उनकी परीक्षा करने वाला कौन होता हूँ ? मुझे जो तिल लगता है , वही उनको पहाड़ मालूम देता हो तो ? अतन्द्रित रहकर पचास वर्ष तक धर्माचरन करने वाले को धर्म अधिक समझ में आता है या राग-द्वेष से भरे हुए मुझ- जैसे को ? और उनके साथ रूठना कैसा ? उनके पास से जाऊँ तो कहाँ जाऊँ ? उनको सन्तपद देकर स्वर्ग का देवता बना देना क्या उनके साथ न्याय होगा ? वे तो कभी अपने को देवता नहीं मानते , महात्मा भी नहीं मानते , हमारे जैसे ही काले बाल वाले मनुष्य वे अपने को मानते हैं , और इसी कारण उनके साथ रह भी सकते हैं। कभी उनका पुण्यप्रकोप उग्र हुआ , तो उसमें बुरा मानने की क्या बात है ? और बुरा मान कर भाग जाएंगे या उनकी प्रखरता में भगवान हमेम भस्म कर दे , ऐसा वरदान माँगेंगे ?’

    काका के स्वर्गवास के बाद श्री झवेरचन्द मेघाणी ने काका के सम्बन्ध में एक लेख लिखा था। उसका शीर्षक था , ‘ अग्नि-कुण्ड में खिला गुलाब ‘। यह शीर्षक इस प्रसंग के लिए शब्दश: यथार्थ था।